🌺 नवरात्रिमय गांव 🌺
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नवरात्र का महीना है। गांव की चौपाल, गली-कूचे, मंदिर और मेला—सब एक अलग ही रंग में रंगे हुए हैं। जैसे ही मैं गांव पहुंचा, लगा मानो पूरा वातावरण मां दुर्गा के भक्ति रस में डूब गया हो।
हर ओर से गूंज रही आवाज़—
“श्री श्री काली माई दुर्गा पूजा समिति आप सभी ग्रामवासियों का हार्दिक अभिनंदन करती है और करती ही रहेगी।”
इसके साथ देवी मां के भजन, ढोल-नगाड़ों की थाप और शंखनाद पूरे गांव को और भी अधिक नवरात्रिमय बना रहे थे। सन्नाटा कहीं नहीं था, बल्कि हर कोना जीवन और उल्लास से भर गया था।
गांव के कुछ युवा सदस्य घर-घर जाकर पूजा का चंदा बटोर रहे थे। उनके उत्साह में सेवा भाव साफ झलकता था। मेले में दुकानों की चहल-पहल, गुब्बारों की उड़ान, बच्चों की खिलखिलाहट—सब मिलकर गांव को एक त्यौहार की धरती बना रहे थे।
मैं अपने कदमों को थामे गांव के तीन मुहान से घर की ओर चला। रास्ते में विजय चाचा दिखे—सिर पर गमछा, हाथ में खंती। उनकी चाल हमेशा की तरह धीमी मगर सधी हुई। शायद खेतों की ओर जा रहे हों, या फिर यूं ही अपनी मिट्टी का हालचाल लेने निकले हों।
घर के मड़ई में मेरी गाय बंधी थी। मड़ई की छांव तले खड़ी उसकी आंखें जैसे कह रही हों—“मुझे ये बंधन क्यों?” लेकिन फिर भी वह शांति से खड़ी थी। उसके पास से गुजरते हुए लगा जैसे गांव की आत्मा ही मुझे देख रही हो।
बगान में नेनुआ और लौकी की बेलें लहराती थीं। उन पर खिले फूल हवा में ऐसी सुगंध घोल रहे थे, जो मन को भक्ति और श्रृंगार दोनों रस में डुबो दे। तितलियां उन फूलों पर जैसे रंग भर रही थीं, मानो गांव का श्रृंगार स्वयं प्रकृति कर रही हो।
अचानक, छोटकी बहन दौड़ती आई। आकर मेरे पैर छुए और बोली, “प्रणाम भैया।”
उसके हाथ में लौटनी थी, जल की बूंदें अब भी चमक रही थीं। चेहरे पर पूजा का तेज और आंखों में स्नेह देखकर क्षणभर को लगा—क्या सचमुच मैं किसी देवता से बढ़कर हूं? पर तुरंत मन ने टोका—नहीं, इंसान भगवान कैसे हो सकता है! शायद यह तो मेरे भावों की उड़ान थी।
और तभी मां दिखीं। मां रसोई में व्यस्त थीं। चेहरे पर वही सहजता, वही प्रेम। मां को देखना और उनका आशीर्वाद लेना मानो मेरे लिए नवरात्र की सबसे बड़ी पूजा हो।
कलम अब रुकना चाहती है। क्योंकि मां की ममता और गांव का नवरात्र—दोनों ही शब्दों से परे हैं।
आज इतना ही लिख पाता हूं। आगे कभी मन हुआ, तो इस श्रृंगारमय गांव की और बातें आपसे जरूर साझा करूंगा।
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