वह शाम शायद साल की सबसे उदास शाम थी, जब मैंने एक भरे-पूरे कैफे के बीच खुद को एक अजीब से सन्नाटे में घिरा पाया। चारों तरफ कुर्सियां भरी थीं, कॉफ़ी की महक हवा में तैर रही थी और हल्की संगीत की धुन भी बज रही थी, लेकिन वहां 'संवाद' गायब था। हर मेज पर बैठे लोग एक-दूसरे के सामने तो थे, लेकिन उनकी नजरें अपनी हथेलियों में सिमटे उस चमकदार स्क्रीन पर जमी थीं जिसे हम स्मार्टफोन कहते हैं। वह दृश्य आज के आधुनिक समाज की उस कड़वी हकीकत का जीता-जागता विज्ञापन था, जिसे मैं 'डिजिटल सन्नाटा' कहता हूँ। हम इतिहास के उस दौर में जी रहे हैं जहाँ हम तकनीकी रूप से सबसे अधिक 'जुड़े' हुए हैं, लेकिन मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर शायद सबसे ज्यादा अकेले और कटे हुए भी।
यह अकेलापन उस अकेलेपन से बिल्कुल अलग है जो पुराने समय में एकांत कहलाता था। एकांत में मनुष्य खुद से मिलता था, लेकिन इस डिजिटल अकेलेपन में हम खुद से भी भाग रहे हैं। आज की दुनिया में 'फुर्सत' एक खोया हुआ शब्द बन गया है। पहले जब दो लोग साथ बैठते थे, तो उनके बीच मौन भी एक भाषा होती थी। आज उस मौन को भरने के लिए हम तुरंत अपनी जेब से फोन निकाल लेते हैं। हमें डर लगता है कि कहीं सामने वाले की आंखों में झांकना न पड़ जाए, कहीं कोई गहरी बात न निकल आए, या कहीं हमें अपनी ही बेचैनी का सामना न करना पड़ जाए। हम 'नोटिफिकेशन' के उस छोटे से लाल घेरे में अपनी खुशियां और अपनी बेचैनी तलाशने लगे हैं।
विडंबना देखिए कि हमारी फ्रेंड-लिस्ट हजारों में है, लेकिन जब मन के किसी कोने में कोई गहरी बात चुभती है, तो स्क्रॉल करते हुए अंगूठे रुकते नहीं हैं क्योंकि हमें पता है कि वहां 'सुनने' वाला कोई नहीं, सिर्फ 'देखने' वाले हैं। हमने अपनी भावनाओं को 'इमोजी' के छोटे-छोटे पैकेटों में बंद कर दिया है। दुख जताने के लिए एक उदास चेहरा भेज देना काफी है और खुशी के लिए चंद पीले हंसते हुए चेहरे। लेकिन क्या वह पीला चेहरा वाकई उस खिलखिलाहट की जगह ले सकता है जो अपनों के साथ बैठकर आती थी? क्या एक 'लाइक' उस थपकी का विकल्प हो सकता है जो कोई दोस्त कंधे पर देता था? शायद नहीं। हम संवेदनाओं के 'इंस्टेंट नूडल्स' के दौर में हैं, जहाँ सब कुछ तुरंत चाहिए, लेकिन उसमें वह पोषण और गहराई गायब है जो धीमे और ठहरे हुए रिश्तों में होती थी।
आज का युवा, और सच कहूं तो हर पीढ़ी, एक अदृश्य 'परफॉर्मेंस' के दबाव में जी रही है। हमें अपनी जिंदगी जीनी कम, दिखानी ज्यादा पड़ रही है। हम किसी खूबसूरत सूर्यास्त को अपनी आंखों से कम और कैमरे के लेंस से ज्यादा देखते हैं। हमारी प्राथमिकता यह नहीं होती कि उस पल की शांति को अपने भीतर उतारें, बल्कि यह होती है कि उसे एक 'स्टोरी' बनाकर दुनिया को बताएं कि हम कितने खुश हैं। यह एक किस्म का मानसिक प्रदर्शनवाद है, जहाँ हम दूसरों की तालियों के मोहताज हो गए हैं। और जब वे तालियां या 'लाइक' कम मिलते हैं, तो हम एक गहरे अवसाद और तुलना के भंवर में फंस जाते हैं। हम दूसरों की सजी-धजी डिजिटल जिंदगी से अपनी उलझी हुई वास्तविक जिंदगी की तुलना करने लगते हैं, यह भूलकर कि स्क्रीन के उस पार वाला इंसान भी उसी खालीपन से जूझ रहा है।
इस डिजिटल सन्नाटे ने हमारे परिवारों के भीतर भी एक दीवार खड़ी कर दी है। एक ही घर के अलग-अलग कमरों में बैठे सदस्य एक-दूसरे को व्हाट्सएप पर संदेश भेजते हैं। डाइनिंग टेबल पर हाथ में चम्मच कम और फोन ज्यादा होता है। यह सिर्फ समय की बर्बाद नहीं है, यह उस आत्मीयता की हत्या है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी कहानियों और किस्सों से ट्रांसफर होती थी। अब दादा-दादी के पास सुनाने को कहानियां तो हैं, लेकिन पोते-पोतियों के पास सुनने का धैर्य नहीं है, क्योंकि उनके 'शॉर्ट्स' और 'रील्स' उन्हें 15 सेकंड में नया रोमांच दे रहे हैं। हम धैर्य खोते जा रहे हैं। हमें अब गहराई से पढ़ना, गहराई से सोचना और गहराई से महसूस करना बोझ लगने लगा है।
हकीकत तो यह है कि इंटरनेट ने दूर बैठे लोगों को करीब लाने का वादा किया था, लेकिन इसने करीब बैठे लोगों को कोसों दूर कर दिया है। हम एक 'ग्लोबल विलेज' में तो रह रहे हैं, लेकिन उस गांव में हर घर के दरवाजे भीतर से बंद हैं। हम अपनी पहचान को उन 'हैशटैग्स' में ढूंढ रहे हैं जो हर हफ्ते बदल जाते हैं। आज हम जिस दौर में हैं, वहां 'प्राइवेसी' का मतलब बदल गया है। हम अपनी निजी बातें अजनबियों के साथ साझा कर रहे हैं और अपनों के सामने अजनबी बने हुए हैं। यह सन्नाटा गहरा है क्योंकि यह शोर के बीच पैदा हुआ है। यह वह सन्नाटा है जो तब महसूस होता है जब फोन की बैटरी खत्म हो जाती है और हमें अचानक पता चलता है कि हमारे पास बात करने के लिए कोई असल इंसान नहीं है।
हमें यह समझना होगा कि तकनीक एक साधन थी, साध्य नहीं। वह हमारी सुविधा के लिए थी, हमारी संवेदनाओं को निगलने के लिए नहीं। अगर हम अब भी नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियां शायद यह भूल ही जाएंगी कि किसी का हाथ थामकर बिना कुछ बोले मीलों चलना क्या होता है। वे शायद यह नहीं जान पाएंगे कि बारिश की बूंदों को महसूस करना और उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर डालने में कितना बड़ा अंतर है। हमें 'लॉग आउट' करना सीखना होगा ताकि हम अपनी असल जिंदगी में 'लॉग इन' कर सकें। हमें उन पलों को बचाना होगा जहाँ स्क्रीन की रोशनी नहीं, बल्कि अपनों की आंखों की चमक हमारे चेहरे को रोशन करे।
अंततः, यह लेख किसी तकनीक का विरोध नहीं है, बल्कि उस खोती हुई इंसानियत की पुकार है जो इस डिजिटल भीड़ में कहीं दब गई है। हमें फिर से उस कला को सीखना होगा जहाँ हम फोन को किनारे रखकर एक-दूसरे की खामोशी को पढ़ सकें। सन्नाटा बुरा नहीं होता, अगर वह एकांत का हो, लेकिन वह सन्नाटा खतरनाक है जो भीड़ के बीच आपको अकेला महसूस कराए। वक्त आ गया है कि हम अपनी जेबों में रखे इस छोटे से यंत्र को अपनी दुनिया न समझें, बल्कि खिड़की के बाहर की उस दुनिया को देखें जो असली है, जिसमें धूल है, पसीना है, संघर्ष है और सबसे बढ़कर—जिंदा एहसास हैं। तभी हम इस 'डिजिटल सन्नाटे' को तोड़कर फिर से मनुष्य बन पाएंगे।
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गोलू कुमार गुप्ता
पटना , बिहार
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