लड़के ने अपने मफलर को थोड़ा और लपेटा और चाय के कुल्हड़ को दोनों हथेलियों के बीच दबा लिया। शायद चाय से ज्यादा गर्माहट उसे कुल्हड़ की सोंधी मिट्टी से मिल रही थी। लड़की सबसे निचली सीढ़ी पर बैठी, पानी की हल्की लहरों को घूर रही थी। काफी देर की रहस्यमयी चुप्पी के बाद उसने एक छोटा सा पत्थर पानी में उछाला। 'छपाक' की आवाज़ से सन्नाटा थोड़ा दरका।
"इतनी गहरी शांति में भी तुम शोर ढूँढ ही लेती हो," लड़के ने कुल्हड़ से एक घूंट लेते हुए बिना उसकी तरफ देखे कहा।
लड़की ने उसकी ओर एक तीखी और शिकायती नज़र डाली। "और तुम? तुम हर बात को इतने भारीपन से क्यों लेते हो? ये जो तुम्हारे भीतर एक बेवजह का 'ठहराव' है न... मुझे कभी-कभी इससे बहुत घुटन होने लगती है।"
लड़के ने मुस्कुराकर खाली कुल्हड़ बगल में रख दिया। "घुटन ठहराव से नहीं होती। घुटन भागते रहने की उस आदत से होती है, जो हमें कभी रुकने नहीं देती। हम सब एक ऐसी ट्रेन में बैठे हैं, जिसे बस किसी तरह अगले स्टेशन पर पहुँचने की जल्दी है। खिड़की से बाहर का सुकून भरा परिदृश्य कोई देखना ही नहीं चाहता।"
"तो क्या हमेशा इसी घाट पर बैठे रहें? ज़िंदगी में कुछ 'हासिल' नहीं करना?" लड़की की आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी थी।
"हासिल?" लड़का थोड़ा हँसा, एक थकी हुई सी हँसी। "प्रेम में या ज़िंदगी में... जो पूरी तरह 'हासिल' हो गया, वो उसी पल बस एक 'समझौता' बनकर रह जाता है। और जहाँ समझौता आ गया, वहाँ प्रेम अपनी आज़ादी खो देता है।"
लड़की कुछ देर चुप रही। उसकी आँखों में सेतु की वो दूर वाली पीली रोशनी तैर रही थी।
"तुम्हारी यही बातें मुझे डराती हैं," उसने एक गहरी साँस छोड़ते हुए कहा। "मैं एक आम सी लड़की हूँ। मुझे बस छोटी-छोटी खुशियाँ चाहिए, एक सधा हुआ कल चाहिए... और तुम मुझे हमेशा अनंत और शून्यता की बातें बताते हो। मुझे लगता है जैसे मैं महज़ इक्कीस पन्नों की कोई बहुत साधारण सी किताब हूँ, और तुम कोई ऐसा महाकाव्य जिसे समझना मेरे बस का नहीं।"
लड़के ने धीरे से खिसक कर उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। उसकी उंगलियाँ बर्फ की तरह ठंडी थीं।
"कोई भी किताब पन्नों की गिनती से बड़ी नहीं होती," लड़के ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "वो उस शिद्दत से बड़ी होती है, जिससे उसे पढ़ा जाता है। अगर कोई उन इक्कीस पन्नों को ही उम्र भर पढ़ता रहे, हर बार एक नया अर्थ निकाले... तो क्या वो किसी महाकाव्य से कम है?"
लड़की के भीतर का सारा शोर जैसे अचानक शांत हो गया। पटना की वो कंपा देने वाली सर्दी अब उसे उतनी बुरी नहीं लग रही थी। कंकड़बाग की उन भीड़-भाड़ वाली सड़कों और दिन भर की भागदौड़ से दूर, उसे लगा कि शायद इस लड़के के भीतर जो खामोशी है, वही उसका असल घर है।
"तो... पढ़ोगे मुझे? हर बार एक नए अर्थ के साथ?" उसने अपनी ठंडी उंगलियों को लड़के के हाथ में और कसते हुए पूछा।
"जब तक ये आँखें साथ देंगी... और जब तक ये गंगा इसी इत्मीनान से बहती रहेगी," लड़के ने नदी की तरफ देखते हुए कहा।
उस रात कोहरे ने उन दोनों को अपनी चादर में ऐसे ढक लिया, जैसे कोई बहुत पुरानी, आधी-अधूरी रह गई कविता को आख़िरकार उसका मुकम्मल आख़िरी पन्ना मिल गया हो।
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