Saturday, 17 January 2026

माफ़ी का रंग

आसमान में सूरज ने अब सिंदूरी रंग बिखेरना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था जैसे दिन भर की थकान के बाद आसमान भी थोड़ा भावुक हो गया हो। हम दोनों पार्क की उस ढलान पर बैठे थे, जहाँ से पूरा शहर किसी खिलौने जैसा छोटा नज़र आता था।

काफी देर तक हमारे बीच कोई शब्द नहीं था। बस ठंडी हवाओं का शोर था और दूर कहीं बजती हुई मंदिर की घंटियाँ।

उसने खामोशी तोड़ते हुए आसमान की ओर इशारा किया और पूछा—
"ये शाम हमेशा इतनी उदास क्यों होती है?"

मैंने उसकी ओर देखा और मुस्कुरा कर कहा, "ये उदासी नहीं है। ये तो 'तसल्ली' का रंग है। देखो न, सूरज ने पूरे दिन तपिश झेली, दुनिया को रौशनी दी और अब वो शांति से विदा ले रहा है। बिना किसी शिकायत के।"

उसने अपनी नज़रें नीची कीं और घास के एक तिनके को उखाड़ते हुए कहा, "पर क्या विदा लेना इतना आसान होता है? जैसे हम इंसानों के बीच... जब कुछ टूटता है, तो पीछे एक कड़वाहट रह जाती है। क्या सूरज को दुख नहीं होता कि उसे कल फिर उसी तपिश में जलना होगा?"

मैंने जवाब दिया, "सूरज को दुख इसलिए नहीं होता क्योंकि वो हर शाम दुनिया को 'माफ़' करके ढलता है। अगर वो अपनी गर्मी का हिसाब रखने लगे, तो कभी दोबारा उग नहीं पाएगा। माफ़ी भी बिल्कुल इस शाम की लालिमा जैसी होती है—गहरी, सुकून देने वाली और सुंदर।"

उसने मेरी आँखों में झाँका, उसकी आँखों में थोड़ी नमी थी। उसने धीमे से पूछा, "तो क्या माफ़ कर देने से सब कुछ पहले जैसा हो जाता है?"

"सब कुछ पहले जैसा शायद न हो," मैंने उसका हाथ धीरे से थामते हुए कहा, "लेकिन माफ़ करने से तुम्हारे अंदर का वो 'भारीपन' ज़रूर खत्म हो जाता है। देखो, सूरज ढल रहा है तभी तो तारों को चमकने की जगह मिलेगी। जब तक तुम कल की शिकायतों को मुट्ठी में भींचे रखोगी, तब तक आने वाले सुकून के लिए हाथ खाली कैसे होगा?"

उसने एक गहरी साँस ली। चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान उभरी, जैसे बरसों का कोई बोझ उतर गया हो।

"आज पहली बार ये लाल रंग मुझे खून जैसा नहीं, बल्कि किसी पुराने घाव के भर जाने जैसा लग रहा है," उसने धीरे से कहा।

सूरज अब पूरी तरह छिप चुका था, पर आसमान में उसकी लाली अभी भी बाकी थी—बिल्कुल वैसे ही, जैसे माफ़ कर देने के बाद दिल में एक मीठा सा अहसास बाकी रह जाता है।
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गोलू
पटना से

Thursday, 8 January 2026

दूरी का भ्रम ( थोड़ा सा इश्क़ )

तुम्हारे न होने से,
सच कहूँ तो...
दुनिया के कामकाज में कोई फर्क नहीं पड़ा।
सूरज अब भी उसी वक्त निकलता है,
हवा अब भी उसी तरह बहती है,
और शहर का शोर भी
बिलकुल वैसा ही है।

सब कुछ... बेहद सामान्य है।

मगर मेरे भीतर,
एक 'अदृश्य' सा बदलाव आ गया है।
पहले, जब मैं कमरे में अकेला होता था,
तो उसे 'एकांत' कहता था,
मगर अब...
वही अकेलापन 'वीरानी' सा लगता है।

तुम्हें पता है?
अब मैं चीजों को सिर्फ देखता नहीं,
उन्हें तुम्हारी नज़र से तौलता हूँ।
कोई अच्छा दृश्य दिखे,
तो पहला ख्याल यही आता है कि
"काश! तुम भी इसे देख पातीं।"

यह अजीब विरोधाभास है 
कि भौतिक रूप से
तुम यहाँ से कोसों दूर हो,
मगर मानसिक रूप से 
तुमने मेरे भीतर इतनी जगह घेर ली है
कि मुझे अपने ही ख्यालों में
पांव रखने के लिए
तुम्हारी यादों से इजाज़त लेनी पड़ती है।

लोग कहते हैं कि दूरियों से
रिश्ते फीके पड़ जाते हैं,
मगर मेरा अनुभव अलग है।
तुम्हारी यह 'गैर-मौजूदगी'
मुझे हर पल
तुम्हारी 'मौजूदगी' का
और गहरा अहसास कराती है।

शायद...
प्रेम पास रहने का नाम नहीं,
बल्कि दूर रहकर भी
किसी को अपने भीतर
लगातार महसूस करने का नाम है।
......
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Tuesday, 6 January 2026

दखल (थोड़ा सा इश्क़)


तुम्हारे आने से पहले,

यकीन मानो...

मेरी दिनचर्या में कोई 'खामी' नहीं थी,

सब कुछ वैसा ही था

जैसा एक मसरूफ शहर का होता है।


वक्त पर जागना,

वक्त पर सोना,

और बीच के सारे पहर

बड़ी मुस्तैदी से खर्च करना

दुनियादारी के हिसाब-किताब में।


मगर...

जब से तुमने मेरे ख्यालों में

जगह बनाई है,

एक अजीब सा 'दखल' महसूस होता है

मेरे सधे हुए वक्त में।


अब अक्सर ऐसा होता है,

कि चाय की प्याली

हाथ में धरी रह जाती है

और भाप ठंडी हो जाती है,

क्योंकि ठीक उसी वक्त

आंखों के सामने से गुज़रती है

तुम्हारी वह हल्की सी मुस्कुराहट।


किताब के पन्ने पलटते हुए

अचानक उंगलियाँ रुक जाती हैं

किसी ऐसे शब्द पर,

जो तुम्हारे नाम जैसा लगता है,

और फिर...

घंटों तक वह पन्ना पलटा नहीं जाता।


यह प्रेम नहीं है शायद,

यह तो मेरे 'वर्तमान' में

तुम्हारी यादों की 'साज़िश' है।


जो मुझे यह अहसास दिलाती है

कि मैं जिसे 'जीना' समझ रहा था,

वह महज सांसें लेना था,

ज़िंदगी तो अब शुरू हुई है—

इस मीठी सी अव्यवस्था के साथ।


हाँ, पहले मैं सिर्फ 'व्यस्त' था,

अब मैं... 'लापता' हूँ!