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Thursday, 8 January 2026

दूरी का भ्रम ( थोड़ा सा इश्क़ )

तुम्हारे न होने से,
सच कहूँ तो...
दुनिया के कामकाज में कोई फर्क नहीं पड़ा।
सूरज अब भी उसी वक्त निकलता है,
हवा अब भी उसी तरह बहती है,
और शहर का शोर भी
बिलकुल वैसा ही है।

सब कुछ... बेहद सामान्य है।

मगर मेरे भीतर,
एक 'अदृश्य' सा बदलाव आ गया है।
पहले, जब मैं कमरे में अकेला होता था,
तो उसे 'एकांत' कहता था,
मगर अब...
वही अकेलापन 'वीरानी' सा लगता है।

तुम्हें पता है?
अब मैं चीजों को सिर्फ देखता नहीं,
उन्हें तुम्हारी नज़र से तौलता हूँ।
कोई अच्छा दृश्य दिखे,
तो पहला ख्याल यही आता है कि
"काश! तुम भी इसे देख पातीं।"

यह अजीब विरोधाभास है 
कि भौतिक रूप से
तुम यहाँ से कोसों दूर हो,
मगर मानसिक रूप से 
तुमने मेरे भीतर इतनी जगह घेर ली है
कि मुझे अपने ही ख्यालों में
पांव रखने के लिए
तुम्हारी यादों से इजाज़त लेनी पड़ती है।

लोग कहते हैं कि दूरियों से
रिश्ते फीके पड़ जाते हैं,
मगर मेरा अनुभव अलग है।
तुम्हारी यह 'गैर-मौजूदगी'
मुझे हर पल
तुम्हारी 'मौजूदगी' का
और गहरा अहसास कराती है।

शायद...
प्रेम पास रहने का नाम नहीं,
बल्कि दूर रहकर भी
किसी को अपने भीतर
लगातार महसूस करने का नाम है।
......
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Monday, 24 November 2025

पहुंच से बाहर

मैंने दुनिया नाप ली,
पहाड़ों के
शिखरों तक पहुँच गया,
उन ऊँचे, बर्फीले
ताज को छू लिया,
जहाँ बादलों का डेरा था।

समुद्र के तल को
देख आया,
गहरे, अथाह नीलेपन में
डूब कर,
मोतियों की खान को
ढूंढ लिया,
अंधेरे की चुप्पी को
सुन आया,
जलजले की लहरों को
गले लगाया।

नदियों के आखिरी छोर
तक पहुँच गया,
उनके उद्गम के रहस्य को
पहचान लिया,
उनके बहाव की गति को
महसूस किया,
हर मोड़ पर प्रकृति के
इशारे को समझा।

मैंने इतिहास के पन्ने
पलट कर देखे,
हर सभ्यता की नींव
को टटोल लिया,
समय की धूल में दबे
राज्यों को जान लिया,
अतीत के हर किस्से को
जीकर आया।

ब्रह्माण्ड के तारों को
गिना है मैंने,
हर ग्रह की कक्षा में
झाँक लिया,
विज्ञान की प्रयोगशाला में
हर सूत्र को हल किया,
जीवन के जटिल सवालों
का जवाब दिया।

मैंने हर यात्रा
पूरी कर ली,
हर मुकाम
हासिल कर लिया,
हर बाधा
पार कर ली,
किन्तु,

“किन्तु मैं नहीं पहुँच
पाया तुम्हारे
'हृदय' तक...!!"

Sunday, 23 November 2025

बस कुछ और पल


बस कुछ और पल...

फिर यह पल भी ढल जाना है।

जो ठहरा लगता है आज,

उसका भी आगे निकल जाना है।


​जो बीते दिन हैं,

बस यादों में ही सुलझ रहे,

उनको धुंधला ही हो जाना है।

बस कुछ और पल...


​जो जीवन की डगर है,

रुकती नहीं, बहती जाती है,

उसको गंतव्य पर पहुंच जाना है।

बस कुछ और पल...


​जो हर श्वास है आती-जाती,

जैसे हवा का झोंका हो कोई,

उसको थम कर ठहर जाना है।

बस कुछ और पल...


​जो उम्मीदें हैं पनपती,

हर रोज नए ख्वाबों की तरह,

उनको स्वप्न ही बन रह जाना है।

बस कुछ और पल...


​जो कल की आहट है,

आज को लीलने को आतुर,

जरा-जरा उसको अतीत हो जाना है।

बस कुछ और पल...


जो रिश्तों की तपिश है,

दिल में धड़कती मौन सी आग,

उसे भी राख बन मिट जाना है।

बस कुछ और पल…


जो मुस्कानों का कारवां है,

आँसुओं की गलियों से गुज़रता,

उसे भी ख़ामोश रात बन जाना है।

बस कुछ और पल…


फिर सब धुंधला, सब फीका,

सिर्फ़ हवाओं में नाम रह जाएंगे,

जो आज है, वो कल कहानी बन जाना है।

बस कुछ और पल…

.....

लेखक: गोलू कुमार गुप्ता

.....

Saturday, 22 November 2025

किसी और की..!


तू ख्वाब थी जो आँखों में,

अब सच्चाई है किसी और की।


जिस दिल की तू धड़कन थी,

अब धड़कन है किसी और की।


मेरी तन्हा सी रातों में,

अब रौशनी है किसी और की।


जिस राह पे तुझे माँगा था,

अब मंज़िल है किसी और की।


तेरे बिना जो अधूरा था,

अब कहानी है किसी और की।


जिस पल में तेरी यादें थीं,

अब वह घड़ी है किसी और की।


मैं जिस गीत में डूबा था,

अब वो धुन है किसी और की।


जो मुस्कान थी होंठों पे,

अब वो हँसी है किसी और की।


तेरे बिना जो वीरान था,

अब वो बस्ती है किसी और की।


जिस छाँव में सुकून मिला,

अब वो छाया है किसी और की।


तेरे नाम पे जो जिया करता,

अब ज़िंदगी है किसी और की।


तेरा हर एक इशारा था,

अब बंदगी है किसी और की।


जिस स्पर्श से दिल महका था,

अब वो खुशबू है किसी और की।


जो लहरें थीं मेरी साँसों की,

अब वो नदी है किसी और की।


तेरे लिए जो अश्क बहे,

अब वो नमी है किसी और की।


मैं रोया तेरे ख्वाबों में,

अब वो नींद है किसी और की।


जिस आँगन में तेरा नाम लिखा,

अब वो चौखट है किसी और की।


जिस रंग से तू रंगी थी,

अब वो होली है किसी और की।


तेरे लिए जो दिल धड़का,

अब वो धड़कन है किसी और की।


तू प्यार थी जो मेरा कभी,

अब चाहत है किसी और की।

- गोलू कुमार गुप्ता

Friday, 11 July 2025

वो शहर

वो शहर

✍️: गोलू कुमार गुप्ता 

__________________


एक शहर था 
न देखा कभी, न जाना था,
न वहाँ की गलियों में
कोई मेरा ठिकाना था।

ना उसके मौसम में
मेरे ख्वाब पलते थे,
ना उसकी राहों में
मेरे कदम चलते थे।

वो बस एक नाम था —
नक़्शे पर लिखा हुआ,
ना कोई एहसास,
ना ही जज़्बातों से भरा हुआ।

मगर फिर आप मिली —
और कुछ तो बदला ज़रूर,
अब वो शहर
लगता है खुदा का नूर।

आपके होने से
वो शहर गुलज़ार हो गया,
हर कोना जैसे
आपके प्यार का इज़हार हो गया।

अब चाहूं मैं
उसी शहर में खो जाना,
आपकी धड़कनों के पास
एक झोपड़ी सा घर बना पाना।

जहां दीवारें भी
आपके नाम से गूंजें,
जहां हवाएं
आपकी खुशबू को सूंघें।

जहां सुबहें
आपके चेहरे की रौशनी से हो रोशन,
और रातें
आपके ख्वाबों में खोए हर क्षण।

जहां बारिश
आपके साथ भीगने की बात कहे,
और ठंडी हवा
आपके स्पर्श की सौगात बहे।

अब वो शहर
मुझे बसाने को बुलाता है,
आपके करीब आने का
हर दिन इक नया वादा कराता है।

कभी सोचा है आपने - 
आपके होने से
एक अनजान शहर भी
कितना प्यारा हो सकता है?

नहीं न?