Thursday, 8 January 2026
दूरी का भ्रम ( थोड़ा सा इश्क़ )
Monday, 24 November 2025
पहुंच से बाहर
Sunday, 23 November 2025
बस कुछ और पल
बस कुछ और पल...
फिर यह पल भी ढल जाना है।
जो ठहरा लगता है आज,
उसका भी आगे निकल जाना है।
जो बीते दिन हैं,
बस यादों में ही सुलझ रहे,
उनको धुंधला ही हो जाना है।
बस कुछ और पल...
जो जीवन की डगर है,
रुकती नहीं, बहती जाती है,
उसको गंतव्य पर पहुंच जाना है।
बस कुछ और पल...
जो हर श्वास है आती-जाती,
जैसे हवा का झोंका हो कोई,
उसको थम कर ठहर जाना है।
बस कुछ और पल...
जो उम्मीदें हैं पनपती,
हर रोज नए ख्वाबों की तरह,
उनको स्वप्न ही बन रह जाना है।
बस कुछ और पल...
जो कल की आहट है,
आज को लीलने को आतुर,
जरा-जरा उसको अतीत हो जाना है।
बस कुछ और पल...
जो रिश्तों की तपिश है,
दिल में धड़कती मौन सी आग,
उसे भी राख बन मिट जाना है।
बस कुछ और पल…
जो मुस्कानों का कारवां है,
आँसुओं की गलियों से गुज़रता,
उसे भी ख़ामोश रात बन जाना है।
बस कुछ और पल…
फिर सब धुंधला, सब फीका,
सिर्फ़ हवाओं में नाम रह जाएंगे,
जो आज है, वो कल कहानी बन जाना है।
बस कुछ और पल…
.....
लेखक: गोलू कुमार गुप्ता
.....
Saturday, 22 November 2025
किसी और की..!
तू ख्वाब थी जो आँखों में,
अब सच्चाई है किसी और की।
जिस दिल की तू धड़कन थी,
अब धड़कन है किसी और की।
मेरी तन्हा सी रातों में,
अब रौशनी है किसी और की।
जिस राह पे तुझे माँगा था,
अब मंज़िल है किसी और की।
तेरे बिना जो अधूरा था,
अब कहानी है किसी और की।
जिस पल में तेरी यादें थीं,
अब वह घड़ी है किसी और की।
मैं जिस गीत में डूबा था,
अब वो धुन है किसी और की।
जो मुस्कान थी होंठों पे,
अब वो हँसी है किसी और की।
तेरे बिना जो वीरान था,
अब वो बस्ती है किसी और की।
जिस छाँव में सुकून मिला,
अब वो छाया है किसी और की।
तेरे नाम पे जो जिया करता,
अब ज़िंदगी है किसी और की।
तेरा हर एक इशारा था,
अब बंदगी है किसी और की।
जिस स्पर्श से दिल महका था,
अब वो खुशबू है किसी और की।
जो लहरें थीं मेरी साँसों की,
अब वो नदी है किसी और की।
तेरे लिए जो अश्क बहे,
अब वो नमी है किसी और की।
मैं रोया तेरे ख्वाबों में,
अब वो नींद है किसी और की।
जिस आँगन में तेरा नाम लिखा,
अब वो चौखट है किसी और की।
जिस रंग से तू रंगी थी,
अब वो होली है किसी और की।
तेरे लिए जो दिल धड़का,
अब वो धड़कन है किसी और की।
तू प्यार थी जो मेरा कभी,
अब चाहत है किसी और की।
- गोलू कुमार गुप्ता
Friday, 11 July 2025
वो शहर
वो शहर
✍️: गोलू कुमार गुप्ता
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एक शहर था
न देखा कभी, न जाना था,
न वहाँ की गलियों में
कोई मेरा ठिकाना था।
ना उसके मौसम में
मेरे ख्वाब पलते थे,
ना उसकी राहों में
मेरे कदम चलते थे।
वो बस एक नाम था —
नक़्शे पर लिखा हुआ,
ना कोई एहसास,
ना ही जज़्बातों से भरा हुआ।
मगर फिर आप मिली —
और कुछ तो बदला ज़रूर,
अब वो शहर
लगता है खुदा का नूर।
आपके होने से
वो शहर गुलज़ार हो गया,
हर कोना जैसे
आपके प्यार का इज़हार हो गया।
अब चाहूं मैं
उसी शहर में खो जाना,
आपकी धड़कनों के पास
एक झोपड़ी सा घर बना पाना।
जहां दीवारें भी
आपके नाम से गूंजें,
जहां हवाएं
आपकी खुशबू को सूंघें।
जहां सुबहें
आपके चेहरे की रौशनी से हो रोशन,
और रातें
आपके ख्वाबों में खोए हर क्षण।
जहां बारिश
आपके साथ भीगने की बात कहे,
और ठंडी हवा
आपके स्पर्श की सौगात बहे।
अब वो शहर
मुझे बसाने को बुलाता है,
आपके करीब आने का
हर दिन इक नया वादा कराता है।
कभी सोचा है आपने -
आपके होने से
एक अनजान शहर भी
कितना प्यारा हो सकता है?
नहीं न?