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08/01/2026

दूरी का भ्रम ( थोड़ा सा इश्क़ )

तुम्हारे न होने से,
सच कहूँ तो...
दुनिया के कामकाज में कोई फर्क नहीं पड़ा।
सूरज अब भी उसी वक्त निकलता है,
हवा अब भी उसी तरह बहती है,
और शहर का शोर भी
बिलकुल वैसा ही है।

सब कुछ... बेहद सामान्य है।

मगर मेरे भीतर,
एक 'अदृश्य' सा बदलाव आ गया है।
पहले, जब मैं कमरे में अकेला होता था,
तो उसे 'एकांत' कहता था,
मगर अब...
वही अकेलापन 'वीरानी' सा लगता है।

तुम्हें पता है?
अब मैं चीजों को सिर्फ देखता नहीं,
उन्हें तुम्हारी नज़र से तौलता हूँ।
कोई अच्छा दृश्य दिखे,
तो पहला ख्याल यही आता है कि
"काश! तुम भी इसे देख पातीं।"

यह अजीब विरोधाभास है 
कि भौतिक रूप से
तुम यहाँ से कोसों दूर हो,
मगर मानसिक रूप से 
तुमने मेरे भीतर इतनी जगह घेर ली है
कि मुझे अपने ही ख्यालों में
पांव रखने के लिए
तुम्हारी यादों से इजाज़त लेनी पड़ती है।

लोग कहते हैं कि दूरियों से
रिश्ते फीके पड़ जाते हैं,
मगर मेरा अनुभव अलग है।
तुम्हारी यह 'गैर-मौजूदगी'
मुझे हर पल
तुम्हारी 'मौजूदगी' का
और गहरा अहसास कराती है।

शायद...
प्रेम पास रहने का नाम नहीं,
बल्कि दूर रहकर भी
किसी को अपने भीतर
लगातार महसूस करने का नाम है।
......
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