"कुछ पन्ने अभी बाकी हैं, कुछ लफ्ज़ अभी अधूरे हैं,
किताब बंद तो कर दी, पर किस्से अभी अधूरे हैं।"
अक्सर रातों के सन्नाटे में जब कलम कागज़ पर घिसती है, तो जेहन में यही सवाल कौंधता है कि आखिर हम अंत के पीछे इतने पागल क्यों हैं? बचपन से सुनी कहानियों ने हमारे दिमाग में एक सांचा फिट कर दिया है कि नायक और नायिका अंत में मिल ही जाते हैं, 'हैप्पी एंडिंग' ही सफलता की निशानी है। लेकिन एक लेखक, जो अपनी रातों की नींद और दिल का सुकून शब्दों के नाम कर चुका हो, वह जानता है कि असली खूबसूरती तो उस खाली जगह में है जो दो शब्दों के बीच रह जाती है। वह अधूरापन, जो टीस बनकर सीने में उठता है, वही साहित्य की जननी है। विरह की अग्नि में तपकर जो शब्द निकलते हैं, वे मुकम्मल इश्क की कविताओं से कहीं ज्यादा धारदार और गहरे होते हैं।
शहर के एक पुराने कोने में बसा वह 'विंटेज कैफे' मेरी पसंदीदा जगह थी। वहां की हवा में पुरानी लकड़ी की मेज, ताजी पिसी हुई कॉफ़ी और धूल जमी किताबों की एक अजीब सी मिली-जुली महक थी। मैं अक्सर वहां खिड़की वाली उस मेज पर बैठता था, जहां से बाहर की दुनिया एक फिल्म की तरह चलती हुई दिखाई देती थी। उस दिन भी मैं अपनी नई किताब, का अंतिम अध्याय पूरा करने की जद्दोजहद में था। किताब लगभग तैयार थी, बस उस आखिरी मोड़ की तलाश थी जो पाठक की आंखों में आंसू छोड़ जाए या उसके होंठों पर एक मुस्कान। मैं चाहता था कि मेरा नायक अपनी खोई हुई मोहब्बत को पा ले, मैं चाहता था कि बरसों का इंतज़ार एक आलिंगन में सिमट जाए। मेरी कलम कागज़ पर रेंग रही थी, पर शब्द जैसे विद्रोह कर रहे थे। शायद वे जानते थे कि हकीकत का व्याकरण इतना सरल नहीं होता।
बाहर आसमान ने करवट ली और देखते ही देखते बूंदाबांदी शुरू हो गई। बारिश की बूंदें कांच की खिड़की पर रेंग रही थीं, जैसे कोई अनकही दास्तां लिख रही हों। ठीक उसी पल कैफे का भारी सागवान का दरवाजा खुला। ठंडी हवा के एक झोंके के साथ वह अंदर दाखिल हुई। वही चिर-परिचित सादगी, वही आंखों में ठहरा हुआ सा एक हल्का सा सन्नाटा, और वही पुरानी आदत—बात करते या सोचते वक्त अपने बाएं हाथ की उंगली से बालों की एक लट को कान के पीछे हटाना। वह मेरी कहानी का वही किरदार थी जिसे मैंने हकीकत के पन्नों पर बरसों पहले खो दिया था। वह सामने वाली मेज पर जाकर बैठ गई, मुझसे महज कुछ फीट की दूरी पर। उसने एक 'ब्लैक कॉफ़ी' का आर्डर दिया और खामोशी से बाहर गिरती बारिश को देखने लगी। उसने मुझे नहीं देखा, या शायद उसने इतनी कुशलता से अनदेखा किया कि मुझे अपनी मौजूदगी पर शक होने लगा।
मेरे हाथ कांपने लगे। मेज पर रखी मेरी अधूरी किताब के पन्ने फड़फड़ाने लगे, मानो वे भी उस शख्स को पहचान गए हों जिसके नाम पर यह पूरी किताब लिखी गई थी। हकीकत और कल्पना के बीच की सीमा धुंधली होने लगी। मेरी किताब का नायक अपनी नायिका के सामने था, लेकिन हमारे बीच शब्दों का कोई पुल नहीं था। हम एक डिजिटल युग के वासी थे, जहाँ 'ब्लू टिक' और 'लास्ट सीन' के बीच भावनाओं का कत्ल होता है। मुझे याद आया वो आखिरी संदेश जो मैंने उसे महीनों पहले भेजा था और जिसका जवाब कभी नहीं आया। वो खामोशी आज भी उस कैफे की मेज पर हमारे बीच एक अदृश्य दीवार बनकर खड़ी थी। मैंने अपनी कलम उठाई और उस पन्ने को आहिस्ता से फाड़ दिया जिस पर मैंने 'मिलन' का दृश्य लिखा था। मुझे अहसास हुआ कि जो कहानी हकीकत में अधूरी रह गई, उसे कागज़ पर जबरदस्ती पूरा करना उस अहसास के साथ बेईमानी होगी।
अधूरापन दरअसल एक वरदान है। अगर मजनू को लैला मिल जाती, तो क्या आज भी दुनिया उनकी मिसाल देती? अगर हीर और रांझा एक साधारण गृहस्थ जीवन बिताते, तो क्या उनके नाम पर महाकाव्य लिखे जाते? नहीं। साहित्य हमेशा उस कमी से पैदा होता है जिसे हम भर नहीं पाते। वह एक खालीपन है जो हमें कुछ नया रचने के लिए उकसाता है। जब हम किसी का इंतज़ार करते हैं, तो उस इंतज़ार की घड़ियों में हमारा व्यक्तित्व बदलता है। हमारे शब्द और गहरे, और भारी हो जाते हैं। डायरी के पन्ने उन बातों से भरने लगते हैं जो हम कभी कह नहीं पाए। एक लेखक के लिए विरह वह खाद है जो उसकी रचनात्मकता के पौधे को सींचती है। जब दिल टूटता है, तो सिर्फ आंसू नहीं गिरते, बल्कि कविताएं और नज्में भी जन्म लेती हैं।
आज के इस दौर में, जहाँ सब कुछ 'इंस्टेंट' है—दो मिनट में नूडल्स, एक सेकंड में संदेश और कुछ ही दिनों में नए रिश्ते—वहां अधूरा रहना एक कला है। व्हाट्सएप पर टाइप करके मिटा दिए गए संदेश उस अधूरेपन की सबसे बड़ी गवाही हैं। वे शब्द जो लिखे तो गए, पर भेजे नहीं गए, उनमें उस 'सेंड' किए गए संदेश से कहीं ज्यादा सच्चाई होती है। वे शब्द हमारी परछाइयों की तरह होते हैं, जो हमेशा साथ रहते हैं पर कभी सामने नहीं आते। इसी तरह, कुछ किताबें भी अधूरी रहनी चाहिए। वे पाठक को एक मौका देती हैं कि वह अपना अंत खुद बुने। वे उसे उस बेचैनी के साथ छोड़ देती हैं जो उसे जिंदगी के दूसरे मायनों को तलाशने पर मजबूर करती है।
वह उठी, उसने अपना कोट ठीक किया और बिना पीछे मुड़े कैफे से बाहर निकल गई। बारिश अब थम चुकी थी, पर सड़कों पर पानी की चमक अभी बाकी थी। मैंने अपनी अधूरी किताब को बंद किया और उसे अपने बैग में रख लिया। वह किताब अब भी अधूरी थी, और शायद हमेशा रहेगी। लेकिन उस शाम मुझे एक बहुत बड़ी सच्चाई समझ में आई। मुकम्मल होना एक अंत है, जबकि अधूरा रहना एक संभावना है। वह अधूरापन ही था जिसने मुझे यहाँ तक पहुँचाया, जिसने मुझे लिखना सिखाया, जिसने मुझे महसूस करना सिखाया कि 'इश्क' और 'समझौते' के बीच की जो महीन लकीर है, वही असल जिंदगी है।
हर अधूरी कहानी का अपना एक गौरव होता है। वह चिल्ला-चिल्ला कर कहती है कि यहाँ कुछ ऐसा था जो दुनिया के बंधनों और व्याकरण के नियमों से बड़ा था। वह बताती है कि भावनाओं को हमेशा अंत तक पहुँचाना ज़रूरी नहीं, कभी-कभी बीच रास्ते में हाथ छूट जाना भी एक दास्तां बन जाता है। मेरी वह किताब, जिसे मैं शायद कभी प्रकाशित न करूँ, मेरी सबसे प्रिय रचना है। क्योंकि उसके उन खाली पन्नों पर आज भी उसका नाम लिखा है, उसकी यादें छपी हैं, और वो तमाम बातें कैद हैं जो कभी लफ्जों की मोहताज नहीं रहीं। अधूरापन ही वह खिड़की है जिससे हम अपने भीतर झांक सकते हैं।
इसलिए, अगर आपका इश्क भी अधूरा है, या आपकी कोई ख्वाहिश बीच में ही टूट गई है, तो उसे एक बोझ मत मानिए। उसे एक 'अधूरी किताब' की तरह सहेज कर रखिये। उसे अपनी ताकत बनाइये। जब शब्द आपके भीतर शोर मचाने लगें, तो उन्हें कागज़ पर बहने दीजिये। याद रखिये, मुकम्मल तो सिर्फ कहानियाँ होती हैं, ज़िंदगी और मोहब्बत तो हमेशा अधूरी ही रहती है। और इसी अधूरेपन में हम सब कहीं न कहीं एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जैसे एक कवि अपनी अधूरी नज़्म में पूरी कायनात समेट लेता है, वैसे ही आप भी अपने इस अधूरेपन को अपनी सबसे खूबसूरत कृति बना सकते हैं। "मुकम्मल न सही, अधूरा ही रहने दो, ये इश्क है साहिब, इसे कागज़ पर बहने दो।"
— गोलू कुमार गुप्ता
पटना

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