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18/03/2026

बदनसीब मैं !

 

Cover Image : Badnasib Main

उस कमरे का हर कोना

वो कमरा जिसमें तुम रहती हो,

सोचो, कितना खुशनसीब होगा न?


छत का वो पंखा, यूँ ही नहीं घूमता,

बस तुम्हें सुकून में देख, खुशी से झूमता है।

वो आईना, जिसमें रोज़ तुम खुद को देखती हो,

सँवारती हो, निहारती हो;

वो बेजान शीशा भी, कितना खुशनसीब होगा न?


तुम्हारे मेज़ पर बिखरी वो रोज़मर्रा की चीज़ें,

तुम्हारी डायरी, पेन, और कॉफ़ी का वो आधा भरा कप,

तुम्हारे छुअन के अहसास को रोज़ महसूस करते हैं।

तुम्हारे बिस्तर की वो मखमली चादर,

जिसकी सिलवटों में आज भी तुम्हारी महक बसी रहती है।


रात को जब तुम थककर खिड़की के पास बैठती हो,

तो वो ठंडी हवा भी, पहले तुम्हें छूकर गुज़रती है।

दीवारों के वो फीके रंग भी,

तुम्हारी मुस्कान की चमक से खिल उठते होंगे।


वहाँ की हर एक चीज़, तुम्हारी मौजूदगी को जीती है,

तुम्हारी आहटों को बेताबी से पहचानती है।

किस्मत तो देखो उस चार-दीवारी के हर ज़र्रे की,

जो तुम्हारे साये में सांस लेता है;


बस एक मैं ही बदनसीब हूँ,

जो तुम्हारे उस कमरे का हिस्सा नहीं हूँ।


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