कहता हूँ…
सब ठीक है।
पर सच ये है…
कुछ भी ठीक नहीं है।
जिस दिन तुम गई…
उस दिन सिर्फ़ तुम नहीं गईं,
कुछ मेरा भी चला गया।
और जो बचा है…
वो मैं नहीं हूँ।
मैं हार गया हूँ।
हाँ…
सीधे, साफ़, बिना बहस....
मैं हार गया हूँ।
कभी सोचा था…
मोहब्बत संभाल लूँगा,
रिश्ता बचा लूँगा,
पर देखो....
तुम चली गईं
और मैं… वहीं का वहीं रह गया।
हा, हा, हा, हा 😅😅
मजेदार है ना?
तुम चल दीं,
और मेरी दुनिया रुक गई।
वो मोड़…
जहाँ तुमने हाथ छोड़ा था,
तब समझ नहीं आया....
तुम्हारा हाथ छूटा था,
या मेरा वजूद।
उस रात चिराग बुझा नहीं था,
बस....
आख़िरी बार लौ काँपी थी।
और फिर ख़ामोशी उतर आई....
सीधी दिल में।
ठंडी।
पत्थर जैसी।
अब शहर शोर करता है,
पर भीतर सब सन्नाटा है।
लोग चलते हैं, हँसते हैं,
और मैं…
बस देखता हूँ।
बिना महसूस किए।
तुमसे शिकवा नहीं।
तुम्हें हक़ था जाने का।
शिकायत बस खुद से है....
क्यों सोचा था,
कि तुम… ठहरोगी?
रिश्ते की जो डोर थी…
कहते हैं वो टूट गई....
झूठ।
डोर नहीं टूटी…
मैं टूटा हूँ।
अब सपने नहीं आते,
इच्छाएँ नहीं जगतीं,
और दिल…
दिल अब सिर्फ़ धड़कता है,
जीता नहीं।
तो हाँ…
आज पहली बार मान रहा हूँ....
सब खत्म।
तुम।
हम।
और वो मैं....
जो प्यार करता था।
अब बस एक ठंडी सच्चाई बची है.....
मैं हार चुका हूँ।
और तुम्हारा जाना ही
मेरी कहानी का आख़िरी वाक्य था।
हां, मैं हार गया हूं।
हां, मैं हार गया हूं।
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