Monday, 24 November 2025
पहुंच से बाहर
Sunday, 23 November 2025
बस कुछ और पल
बस कुछ और पल...
फिर यह पल भी ढल जाना है।
जो ठहरा लगता है आज,
उसका भी आगे निकल जाना है।
जो बीते दिन हैं,
बस यादों में ही सुलझ रहे,
उनको धुंधला ही हो जाना है।
बस कुछ और पल...
जो जीवन की डगर है,
रुकती नहीं, बहती जाती है,
उसको गंतव्य पर पहुंच जाना है।
बस कुछ और पल...
जो हर श्वास है आती-जाती,
जैसे हवा का झोंका हो कोई,
उसको थम कर ठहर जाना है।
बस कुछ और पल...
जो उम्मीदें हैं पनपती,
हर रोज नए ख्वाबों की तरह,
उनको स्वप्न ही बन रह जाना है।
बस कुछ और पल...
जो कल की आहट है,
आज को लीलने को आतुर,
जरा-जरा उसको अतीत हो जाना है।
बस कुछ और पल...
जो रिश्तों की तपिश है,
दिल में धड़कती मौन सी आग,
उसे भी राख बन मिट जाना है।
बस कुछ और पल…
जो मुस्कानों का कारवां है,
आँसुओं की गलियों से गुज़रता,
उसे भी ख़ामोश रात बन जाना है।
बस कुछ और पल…
फिर सब धुंधला, सब फीका,
सिर्फ़ हवाओं में नाम रह जाएंगे,
जो आज है, वो कल कहानी बन जाना है।
बस कुछ और पल…
.....
लेखक: गोलू कुमार गुप्ता
.....
Saturday, 22 November 2025
किसी और की..!
तू ख्वाब थी जो आँखों में,
अब सच्चाई है किसी और की।
जिस दिल की तू धड़कन थी,
अब धड़कन है किसी और की।
मेरी तन्हा सी रातों में,
अब रौशनी है किसी और की।
जिस राह पे तुझे माँगा था,
अब मंज़िल है किसी और की।
तेरे बिना जो अधूरा था,
अब कहानी है किसी और की।
जिस पल में तेरी यादें थीं,
अब वह घड़ी है किसी और की।
मैं जिस गीत में डूबा था,
अब वो धुन है किसी और की।
जो मुस्कान थी होंठों पे,
अब वो हँसी है किसी और की।
तेरे बिना जो वीरान था,
अब वो बस्ती है किसी और की।
जिस छाँव में सुकून मिला,
अब वो छाया है किसी और की।
तेरे नाम पे जो जिया करता,
अब ज़िंदगी है किसी और की।
तेरा हर एक इशारा था,
अब बंदगी है किसी और की।
जिस स्पर्श से दिल महका था,
अब वो खुशबू है किसी और की।
जो लहरें थीं मेरी साँसों की,
अब वो नदी है किसी और की।
तेरे लिए जो अश्क बहे,
अब वो नमी है किसी और की।
मैं रोया तेरे ख्वाबों में,
अब वो नींद है किसी और की।
जिस आँगन में तेरा नाम लिखा,
अब वो चौखट है किसी और की।
जिस रंग से तू रंगी थी,
अब वो होली है किसी और की।
तेरे लिए जो दिल धड़का,
अब वो धड़कन है किसी और की।
तू प्यार थी जो मेरा कभी,
अब चाहत है किसी और की।
- गोलू कुमार गुप्ता
Friday, 21 November 2025
मैं हार गया..!
कहता हूँ…
सब ठीक है।
पर सच ये है…
कुछ भी ठीक नहीं है।
जिस दिन तुम गई…
उस दिन सिर्फ़ तुम नहीं गईं,
कुछ मेरा भी चला गया।
और जो बचा है…
वो मैं नहीं हूँ।
मैं हार गया हूँ।
हाँ…
सीधे, साफ़, बिना बहस....
मैं हार गया हूँ।
कभी सोचा था…
मोहब्बत संभाल लूँगा,
रिश्ता बचा लूँगा,
पर देखो....
तुम चली गईं
और मैं… वहीं का वहीं रह गया।
हा, हा, हा, हा 😅😅
मजेदार है ना?
तुम चल दीं,
और मेरी दुनिया रुक गई।
वो मोड़…
जहाँ तुमने हाथ छोड़ा था,
तब समझ नहीं आया....
तुम्हारा हाथ छूटा था,
या मेरा वजूद।
उस रात चिराग बुझा नहीं था,
बस....
आख़िरी बार लौ काँपी थी।
और फिर ख़ामोशी उतर आई....
सीधी दिल में।
ठंडी।
पत्थर जैसी।
अब शहर शोर करता है,
पर भीतर सब सन्नाटा है।
लोग चलते हैं, हँसते हैं,
और मैं…
बस देखता हूँ।
बिना महसूस किए।
तुमसे शिकवा नहीं।
तुम्हें हक़ था जाने का।
शिकायत बस खुद से है....
क्यों सोचा था,
कि तुम… ठहरोगी?
रिश्ते की जो डोर थी…
कहते हैं वो टूट गई....
झूठ।
डोर नहीं टूटी…
मैं टूटा हूँ।
अब सपने नहीं आते,
इच्छाएँ नहीं जगतीं,
और दिल…
दिल अब सिर्फ़ धड़कता है,
जीता नहीं।
तो हाँ…
आज पहली बार मान रहा हूँ....
सब खत्म।
तुम।
हम।
और वो मैं....
जो प्यार करता था।
अब बस एक ठंडी सच्चाई बची है.....
मैं हार चुका हूँ।
और तुम्हारा जाना ही
मेरी कहानी का आख़िरी वाक्य था।
हां, मैं हार गया हूं।
हां, मैं हार गया हूं।
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Sunday, 24 August 2025
ज़रूरी है क्या..? 💔
ज़रूरी है क्या.. 💔
लबों तक जो बात आये,
हर वो बात करना ज़रूरी है क्या?
इश्क़ तो सबको हो जाता है,
ये बताओ इज़हार करना ज़रूरी है क्या?
फ़रिश्ता बन हज़ार ख़्वाब दिखाकर,
झूठे वादे करना ज़रूरी है क्या?
रिश्तेदारी तो सब जानते हैं,
ये बताओ सबको अपना कहना ज़रूरी है क्या?
बरसों पहले जो आईना टूटा था,
आज वापस जुड़ने लगे तो मुश्किल है क्या?
तुमने तो मोहब्बत का अंजाम देखा है,
ये बताओ दोबारा इश्क़ करना सही है क्या?
बेइंतहां न सही, इश्क़ मैंने भी किया था,
इसका भरोसा दिलाना ज़रूरी है क्या?
तुम जो रूठ जाते हो हर छोटी सी बात पर,
हर बार तुम्हें मनाना ज़रूरी है क्या?
सूरत नहीं, सिरत पूजता हूँ,
ऐसी बातें कहना ज़रूरी है क्या?
तुम्हारे बिन मैं एक पल नहीं जी सकता,
हर एक से ये कहना ज़रूरी है क्या?
दिल के जज़्बात आँखों से टपक पड़ें,
हर आंसू दिखाना ज़रूरी है क्या?
खामोशी भी तो एक जुबान होती है,
हर दर्द को बताना ज़रूरी है क्या?
मोहब्बत अगर सच्ची है दिल से,
तो सबूतों में तोलना ज़रूरी है क्या?
धड़कनों में तुम्हारा नाम बस जाए,
तो दुनिया को बताना ज़रूरी है क्या?
रिश्ते निभते हैं एहसास से,
हर बार क़सम खाना ज़रूरी है क्या?
अगर तुम समझते हो मेरी खामोशी,
तो लफ़्ज़ों में समझाना ज़रूरी है क्या?
Saturday, 12 July 2025
एक बार गले लगा लो..!
एक बार गले लगा लो
मेरे मन के आंगन में
अब न चहचहाते हैं सपने
भावनाओं की शाखों से
झर चुके हैं सारे पत्ते
मेरे शब्दों की मिट्टी
बिना बारिश के सूख चली है
आशाओं की किरचियाँ
हर सांस में चुभने लगी हैं
हृदय की हर धड़कन
अब बस एक पुकार है
तेरे स्पर्श की गूंज
मौन में भी आकार है
तुम्हारी एक झप्पी
सर्द हवाओं में ओस सी लगे
जैसे बंजर ज़मीन पर
पहली बार बरसात जगे
तुम आओ तो
ये सूनी दीवारें बोल उठें
ये खामोश शामें
तेरी बातों में डोल उठें
प्रियतम,
बस एक बार गले लगा लो
इस टूटती चेतना में
थोड़ा जीवन जगा लो
मेरे अंदर का शून्य
तेरी ऊष्मा से भर जाएगा
जो अधूरा सा लगता हूं मैं
तेरे आलिंगन से संवर जाएगा
मुझे मेरी ही साँसों में
फिर से तुम लौटा दो
जो मरा सा जी रहा हूं
उसे जीना सिखा दो
बस एक बार
गले लगा लो
और फिर चाहे
कुछ न कहना, कुछ न लेना...
बस, मुझे फिर से "मैं" बना लो।
Friday, 11 July 2025
वो शहर
वो शहर
✍️: गोलू कुमार गुप्ता
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एक शहर था
न देखा कभी, न जाना था,
न वहाँ की गलियों में
कोई मेरा ठिकाना था।
ना उसके मौसम में
मेरे ख्वाब पलते थे,
ना उसकी राहों में
मेरे कदम चलते थे।
वो बस एक नाम था —
नक़्शे पर लिखा हुआ,
ना कोई एहसास,
ना ही जज़्बातों से भरा हुआ।
मगर फिर आप मिली —
और कुछ तो बदला ज़रूर,
अब वो शहर
लगता है खुदा का नूर।
आपके होने से
वो शहर गुलज़ार हो गया,
हर कोना जैसे
आपके प्यार का इज़हार हो गया।
अब चाहूं मैं
उसी शहर में खो जाना,
आपकी धड़कनों के पास
एक झोपड़ी सा घर बना पाना।
जहां दीवारें भी
आपके नाम से गूंजें,
जहां हवाएं
आपकी खुशबू को सूंघें।
जहां सुबहें
आपके चेहरे की रौशनी से हो रोशन,
और रातें
आपके ख्वाबों में खोए हर क्षण।
जहां बारिश
आपके साथ भीगने की बात कहे,
और ठंडी हवा
आपके स्पर्श की सौगात बहे।
अब वो शहर
मुझे बसाने को बुलाता है,
आपके करीब आने का
हर दिन इक नया वादा कराता है।
कभी सोचा है आपने -
आपके होने से
एक अनजान शहर भी
कितना प्यारा हो सकता है?
नहीं न?
