Friday, 11 July 2025

वो शहर

वो शहर

✍️: गोलू कुमार गुप्ता 

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एक शहर था 
न देखा कभी, न जाना था,
न वहाँ की गलियों में
कोई मेरा ठिकाना था।

ना उसके मौसम में
मेरे ख्वाब पलते थे,
ना उसकी राहों में
मेरे कदम चलते थे।

वो बस एक नाम था —
नक़्शे पर लिखा हुआ,
ना कोई एहसास,
ना ही जज़्बातों से भरा हुआ।

मगर फिर आप मिली —
और कुछ तो बदला ज़रूर,
अब वो शहर
लगता है खुदा का नूर।

आपके होने से
वो शहर गुलज़ार हो गया,
हर कोना जैसे
आपके प्यार का इज़हार हो गया।

अब चाहूं मैं
उसी शहर में खो जाना,
आपकी धड़कनों के पास
एक झोपड़ी सा घर बना पाना।

जहां दीवारें भी
आपके नाम से गूंजें,
जहां हवाएं
आपकी खुशबू को सूंघें।

जहां सुबहें
आपके चेहरे की रौशनी से हो रोशन,
और रातें
आपके ख्वाबों में खोए हर क्षण।

जहां बारिश
आपके साथ भीगने की बात कहे,
और ठंडी हवा
आपके स्पर्श की सौगात बहे।

अब वो शहर
मुझे बसाने को बुलाता है,
आपके करीब आने का
हर दिन इक नया वादा कराता है।

कभी सोचा है आपने - 
आपके होने से
एक अनजान शहर भी
कितना प्यारा हो सकता है?

नहीं न?


2 comments:

Aradhna said...

Shayad ye sehar utna acha nhi dikha aaj se pehle 🫣

Golu Graphics World said...

achha ji 😍