Saturday, 14 March 2026

ये महक , ये लम्हा !

 

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आज कमरे में अकेला होकर भी मैं अकेला नहीं था। बदन पर तुम्हारी दी हुई वह काली कमीज थी, जिसकी हर एक सिलवट में तुम्हारे स्पर्श की गर्माहट महसूस हो रही थी। सामने लैपटॉप की स्क्रीन पर तुम्हारी वह कातिल मुस्कान बिखरी थी, जिसने पूरे कमरे को एक रूहानी रोशनी से भर दिया था।


तभी खिड़की से बसंती हवा का एक शोख झोंका आया, जो मानो तुम्हारे आंचल की खुशबू लेकर आया हो। उस ठंडी छुअन ने जैसे मेरे कानों में तुम्हारी पायल की खनक घोल दी। दूरी तो बस जिस्मों की है, रूह तो इस वक्त भी एक-दूसरे में सिमटी हुई है। इसी भावुक और श्रृंगारिक मिलन को मैंने इन पंक्तियों में पिरोने की कोशिश की है:



ये महक , ये लम्हा 

...........

कमीज की हर एक सिलवट में,

जैसे तुम्हारे हाथों की छुअन बाकी है।

तस्वीर बोलती तो नहीं,

पर तुम्हारी वो मुस्कान,

हर अनकही बात का साखी है।


लैपटॉप की स्क्रीन से उठकर,

तुम्हारी ये हंसी जैसे कमरे में टहलने लगी है।

बसंती हवा का ये झोंका,

अब मेरी आँखों को मलने लगी है।


मुझे लगता है—

तुमने ही भेजा है ये पैगाम इस हवा के साथ,

कि दूर रहकर भी,

तुम चल रही हो मेरे साथ, थामे मेरा हाथ।


ये महक, ये लम्हा, ये तुम्हारी दी हुई कमीज,

जैसे दुनिया की सबसे नायाब चीज़।

मैं बस यहीं, इसी पल में ठहर जाना चाहता हूँ,

तुम्हारी इस तस्वीर में, खुद को खो देना चाहता हूँ।

2 comments:

Anonymous said...

Such beautifully written 👏

Ink By Golu said...

Thank you