क्या साहित्य केवल आदर्शवाद की सुंदर चित्रकारी है, या उस कड़वे यथार्थ का कच्चा चिट्ठा जिसे समाज अक्सर हाशिए पर धकेल देता है? समकालीन लेखन में भाषा की पवित्रता और जीवन की नग्नता के बीच एक निरंतर द्वंद्व चलता रहा है। यहाँ 'गाली' केवल एक वर्जित शब्द नहीं, बल्कि उस सामाजिक कुंठा और आक्रोश की अभिव्यक्ति है, जिसे व्याकरण के सलीके अक्सर बयां नहीं कर पाते।
साहित्य ऐतिहासिक रूप से दो धाराओं में बंटा रहा है—एक जो 'शिवं' और 'सुंदरं' की खोज करती है, और दूसरी जो 'सत्य' की नग्नता को बिना किसी लाग-लपेट के स्वीकार करती है। लंबे समय तक साहित्य को केवल उच्च वर्गों की परिष्कृत भाषा का माध्यम माना गया, जहाँ अपशब्दों के लिए कोई स्थान नहीं था। लेकिन बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब साहित्य का लोकतंत्रीकरण हुआ और वह शोषितों, वंचितों एवं महानगरीय संघर्षों की आवाज़ बना, तो भाषा के नियम टूटने लगे। सांख्यिकीय दृष्टि से देखें तो पिछले दो दशकों में भारतीय उपमहाद्वीप के कथा-साहित्य और पटकथा लेखन में बोलचाल की भाषा का प्रयोग 60% से अधिक बढ़ा है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि पाठक अब 'अलंकृत' भाषा के बजाय 'अनुभवजन्य' भाषा की तलाश में है।
यथार्थवाद का अर्थ ही यही है कि जीवन जैसा घट रहा है, उसे उसी की मूल ध्वनि में चित्रित किया जाए। जब एक लेखक किसी मलिन बस्ती के परिवेश या युद्ध की विभीषिका के बीच खड़े पात्र का चित्रण करता है, तो वहां की भाषा संस्कृतनिष्ठ या व्याकरण-सम्मत नहीं हो सकती। वहां 'गाली' पात्र की मनोवैज्ञानिक स्थिति का डेटा प्रस्तुत करती है। यदि हम वैश्विक साहित्य को देखें, तो जेम्स जॉयस से लेकर चार्ल्स बुकोव्स्की तक, और भारतीय संदर्भ में सआदत हसन मंटो से लेकर आधुनिक कथाकारों तक—सबने समाज की सड़ांध को दिखाने के लिए उन्हीं शब्दों का चुनाव किया जो समाज की नसों में दौड़ते हैं। मंटो पर जब अश्लीलता के मुकदमे चले, तो उन्होंने साफ़ कहा था कि लेखक समाज की नब्ज़ टटोलता है, यदि नब्ज़ में गंदगी है तो उँगलियाँ साफ नहीं रह सकतीं।
साहित्य में गाली की उपस्थिति तब घातक और अश्लील मानी जानी चाहिए, जब उसका उद्देश्य केवल 'सनसनी' पैदा करना हो। डेटा के अनुसार, ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और आधुनिक उपन्यासों की बाढ़ के साथ, लगभग 30% रचनाओं में अपशब्दों का प्रयोग बिना किसी तार्किक आवश्यकता के केवल 'बोल्ड' दिखने के लिए किया जा रहा है। यहाँ साहित्य की मर्यादा खंडित होती है। यथार्थवाद और भाषाई अराजकता के बीच एक महीन रेखा है। एक कुशल लेखक वही है जो गाली का प्रयोग 'हथियार' की तरह करे, न कि उसे पन्नों पर 'कचरे' की तरह फैलाए। गाली तब तक सत्य है जब तक वह पात्र की बेबसी, उसका संताप या उसके परिवेश की प्रामाणिकता को सिद्ध करती है।
आज का पाठक अब उस 'यूटोपिया' (आदर्श लोक) में नहीं रहता जहाँ सब कुछ पवित्र और सुसंस्कृत है। सूचना क्रांति के इस युग में जहाँ हर दिन लाखों शब्द सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों पर साझा किए जाते हैं, वहाँ भाषा का चरित्र बदल चुका है। भाषा अब स्थिर नहीं, बल्कि 'तरल' हो गई है। साहित्य को इस बदलते स्वरूप को स्वीकार करना होगा। मर्यादा शब्दों की बनावट में नहीं, बल्कि लेखक की ईमानदारी में निहित है। यदि समाज का एक बड़ा हिस्सा अभावों और आक्रोश के बीच अपनी भावनाओं को अपशब्दों के माध्यम से व्यक्त करता है, तो साहित्य को उस 'मूक' सत्य को स्वर देना ही होगा।
निष्कर्षतः, साहित्य और गाली का संबंध विरोध का नहीं, बल्कि प्रतिबिंब का है। भाषा एक जैविक प्रक्रिया है जो समाज के साथ विकसित और दूषित होती है। एक लेखक का उत्तरदायित्व उस प्रदूषण को इत्र लगाकर छिपाना नहीं, बल्कि उसे उसकी समग्रता में उद्घाटित करना है। साहित्य वही कालजयी होता है जो अपनी मिट्टी की गंध को नहीं छोड़ता, चाहे वह गंध फूलों की हो या उस सड़ांध की जिसे हम यथार्थ कहते हैं। शब्दों की असली कसौटी उनकी नैतिकता नहीं, बल्कि उनकी 'सत्यता' है। यदि सत्य कड़वा है और उसे व्यक्त करने के लिए समाज द्वारा वर्जित शब्दों का सहारा लेना पड़ता है, तो यह साहित्य की निर्भीकता है, उसकी पराजय नहीं।
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लेखक परिचय:
अनिरुद्ध कुमार गुप्ता 'गोलू' पटना (बिहार) स्थित एक स्वतंत्र लेखक और ग्राफिक डिजाइनर हैं। वे समकालीन विषयों, कविता और उपन्यासों के माध्यम से सामाजिक यथार्थ को स्वर देने के लिए प्रयासरत हैं। साहित्य और कला के प्रति उनका दृष्टिकोण तथ्यात्मक और विश्लेषणपरक है। उनके लेखन को उनके ब्लॉग inkbygolu.in पर पढ़ा जा सकता है। उनसे 7033047038 पर संपर्क किया जा सकता है।
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