Monday, 24 November 2025

पहुंच से बाहर

मैंने दुनिया नाप ली,
पहाड़ों के
शिखरों तक पहुँच गया,
उन ऊँचे, बर्फीले
ताज को छू लिया,
जहाँ बादलों का डेरा था।

समुद्र के तल को
देख आया,
गहरे, अथाह नीलेपन में
डूब कर,
मोतियों की खान को
ढूंढ लिया,
अंधेरे की चुप्पी को
सुन आया,
जलजले की लहरों को
गले लगाया।

नदियों के आखिरी छोर
तक पहुँच गया,
उनके उद्गम के रहस्य को
पहचान लिया,
उनके बहाव की गति को
महसूस किया,
हर मोड़ पर प्रकृति के
इशारे को समझा।

मैंने इतिहास के पन्ने
पलट कर देखे,
हर सभ्यता की नींव
को टटोल लिया,
समय की धूल में दबे
राज्यों को जान लिया,
अतीत के हर किस्से को
जीकर आया।

ब्रह्माण्ड के तारों को
गिना है मैंने,
हर ग्रह की कक्षा में
झाँक लिया,
विज्ञान की प्रयोगशाला में
हर सूत्र को हल किया,
जीवन के जटिल सवालों
का जवाब दिया।

मैंने हर यात्रा
पूरी कर ली,
हर मुकाम
हासिल कर लिया,
हर बाधा
पार कर ली,
किन्तु,

“किन्तु मैं नहीं पहुँच
पाया तुम्हारे
'हृदय' तक...!!"

1 comment:

Anonymous said...

Excellent 👌