सुनो,
मेरे ऑफिस जाने से पहले,
तुम रोज़ ज़रा इत्मीनान से सवरना।
अपनी आँखों के गहरे समंदर के किनारों पर,
सलीके से वो काजल मलना,
और हाँ, माथे पर बिंदी सजाकर,
एक बार बस ज़ोर से गले लग जाना।
मेरे ऑफिस जाने से पहले,
रोज़ अपने हाथों से मुझे खिलाना।
अपने कोमल हाथों से रोटी का एक टुक,
मेरी भूख तक पहुँचाना।
और खाते-खाते जब मैं पसीने से तर हो जाऊँ,
तो अपने पल्लू की हवा से...
मेरे पसीने को सुखाना।
मेरे ऑफिस जाने से पहले,
तुम मुझमें समाना—
खिलखिलाना, मुस्कुराना।
हाँ, बस मेरे ऑफिस जाने से पहले।।

1 comment:
लेखक साहब , इसके लिए सबसे पहले जॉब करना होता है। वैसे बहुत खूब लिखे है।
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