वो पागल थी जो बारिश में भीग के मुस्कुराती थी।
भीगी किताबों में अपने ख्वाब सजाती थी ।
उलझे बालों में उम्मीदों के फूल लगाती थी।
टूटी चूड़ियों से भी मोहब्बत निभाती थी।
वो चाय के प्याले में अक्सर चाँद ढूंढती थी।
रात की तन्हाई में खुद से ही रूठती थी।
बिना वजह आईने से बातें करती जाती थी।
हर मुस्कान के पीछे दर्द छिपा ले जाती थी।
कभी किसी अजनबी में अपना अक्स देखती थी।
फिर उसी से नज़रे चुरा लिया करती थी।
वो पागल थी जो पतंगों को चिट्ठियाँ भेजती थी।
बंद किताबों में अधूरी कहानियाँ रखती थी।
सड़क किनारे फूलों से अपनी पहचान पूछती थी।
हर टूटे खिलौने से दोस्ती निभाती थी।
वो अक्सर बच्चों की तरह दुनिया को समझती थी।
और हर धोखे को भी मासूमियत से सहती थी।
कभी छत पे बैठ कर बादलों को पढ़ती थी।
तो कभी खुद ही अपना नाम मिटा देती थी।
वो पागल थी जो दर्द में भी गुनगुनाती थी।
हर हार में भी जीत की वजह बताती थी।
उसकी आँखों में समंदर सा सुकून था।
पर दिल में तूफानों का जुनून था।
वो पागल थी जो मोहब्बत को पूजा मानती थी।
और हर बेवफाई को भी अपनी भूल जानती थी।
कभी किसी सूने मंदिर में दीप जलाया करती थी।
कभी तन्हा रास्तों को भी घर बनाया करती थी।
वो हँसती थी, जब दुनिया उसे रुलाया करती थी।
और खुद को भी आईने में तसल्ली दिया करती थी।
वो पागल थी... हाँ शायद सच में पागल थी।
जो हर टूटी चीज़ में भी प्यार की मूरत गढ़ती थी।
2 comments:
Waah bahut khub
Kya mast likhe ho bhai
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