हम सब एक ऐसी ट्रेन के मुसाफिर हैं जिसका टाइम-टेबल तो हमारे हाथ में है, पर पटरी कहाँ खत्म होगी, यह कोई नहीं जानता। अक्सर हम अपने आज को उस कल की वेदी पर चढ़ा देते हैं जो अभी आया ही नहीं। हम आज मुस्कुराना भूल जाते हैं क्योंकि हमें लगता है कि कल जब प्रमोशन होगा, कल जब नया घर बनेगा, कल जब सब मुश्किलें खत्म होंगी—तब हम जी भर कर हँसेंगे। पर कड़वा सच तो यही है कि वह कल कभी आता ही नहीं, वह बस अपना भेस बदलकर फिर से एक नया कल बन जाता है और हम ताउम्र बस इंतज़ार की कतार में खड़े रह जाते हैं।
शहर के एक पुराने और गुमनाम कोने में एक छोटा सा कैफे था, जिसका नाम था 'द लास्ट स्टॉप'। उस कैफे की दीवारों पर लगी घड़ियाँ कभी सही वक्त नहीं बताती थीं। कैफे का बूढ़ा मालिक सैमुअल अक्सर कहता था कि यहाँ वक्त इसलिए ठहर जाता है ताकि भागते हुए लोग खुद को ढूंढ सकें। उसी कैफे में हर शाम आर्यन आकर बैठता था। आर्यन एक बड़ी विज्ञापन कंपनी में ऊँचे पद पर था, उसके पास महंगी घड़ी थी, लेटेस्ट स्मार्टफोन था और एक चमकती हुई कार थी, पर उसके चेहरे पर हमेशा एक अजीब सी हड़बड़ी रहती थी। वह कैफे में बैठकर भी अपने लैपटॉप पर उंगलियाँ चलाता रहता, उसकी कॉफी सामने रखी ठंडी हो जाती, पर उसके दिमाग में चल रहा काम कभी खत्म नहीं होता था। उसे लगता था कि आज की यह मेहनत उसे एक शानदार कल देगी।
एक शाम, आर्यन के ठीक सामने वाली टेबल पर एक लड़की आकर बैठी, जिसका नाम ज़ोया था। ज़ोया के पास कोई गैजेट नहीं था, बस एक पुरानी स्केचबुक और एक पेंसिल थी। वह घंटों खामोशी से खिड़की के बाहर गिरती बारिश की बूंदों को देखती और कभी-कभी खुद में ही मुस्कुरा देती थी। आर्यन ने अपनी झुंझलाहट में उससे पूछ ही लिया कि क्या आपको नहीं लगता कि आप यहाँ बैठकर अपना कीमती वक्त और आने वाला कल खराब कर रही हैं? इस वक्त में आप कुछ प्रोडक्टिव कर सकती थीं, कुछ नया प्लान कर सकती थीं। ज़ोया ने अपनी गहरी आँखों से आर्यन की ओर देखा और बहुत धीमे से पूछा कि आर्यन, क्या आपने कभी सोचा है कि अगर कल सुबह सूरज न निकले, तो आपके इस प्रोडक्टिव कल का क्या होगा?
आर्यन उसकी बात सुनकर हँसा और बोला कि ये सब किताबी और दार्शनिक बातें हैं, असल ज़िंदगी में हमें कल के लिए तैयारी करनी ही पड़ती है। तब ज़ोया ने अपनी स्केचबुक आर्यन की तरफ बढ़ाई। उसमें आर्यन का ही एक स्केच था, लेकिन उसमें आर्यन के पीछे एक बहुत बड़ी परछाईं थी जो उसे निगलने वाली थी। ज़ोया ने कहा कि कल को बेहतर बनाने की ज़िद में हम आज की खुशबू लेना भूल जाते हैं। मैंने कल का इंतज़ार करना तीन साल पहले छोड़ दिया था जब एक हादसे ने मुझे बताया कि ज़िंदगी सिर्फ इसी पल का नाम है। डॉक्टरों ने कहा था कि मैं शायद कभी खड़ी नहीं हो पाऊँगी, तब मुझे एहसास हुआ कि हम जिस कल को अपना अधिकार समझते हैं, वह दरअसल खुदा की दी हुई एक बहुत बड़ी लग्जरी है जिसे हम बिना सोचे-समझे खर्च कर देते हैं।
उस शाम पहली बार आर्यन ने अपना लैपटॉप बंद किया। उसने पहली बार उस ठंडी हो चुकी कॉफी का कड़वा लेकिन असली स्वाद महसूस किया। उसने खिड़की के बाहर देखा तो पाया कि बारिश की आवाज़ उसके महंगे हेडफोन के संगीत से कहीं ज़्यादा सुकून देने वाली थी। हम अपनी पूरी ज़िंदगी कल के बीमा और भविष्य की चिंताओं में गुज़ार देते हैं। हम आज कंजूसी करते हैं ताकि कल अमीर बन सकें, हम आज अपनों को गले नहीं लगाते क्योंकि लगता है कि अभी तो बहुत उम्र बाकी है, कल बात कर लेंगे। पर असलियत यही है कि ज़िंदगी की सबसे बड़ी ट्रेजेडी मौत नहीं है, बल्कि वो चीज़ें हैं जो हमारे अंदर मर जाती हैं जब हम ज़िंदा होते हैं। हम अपनी ख्वाहिशों, अपनी हंसी और अपनी मासूमियत का गला घोंट देते हैं ताकि एक काल्पनिक सुरक्षित भविष्य खड़ा कर सकें।
आजकल के दौर में कल एक बहुत बड़ा और मीठा ज़हर बन गया है। हम अक्सर कहते हैं कि कल पक्का मिलेंगे, कल कॉल करता हूँ, या कल से एक नई शुरुआत करेंगे। ये कल हमें एक झूठी तसल्ली देता है कि हमारे पास बहुत वक्त है। लेकिन ज़रा सोचिए उस इंसान के बारे में जिसे आपने आखिरी बार देखा था और मन में सोचा था कि इससे तो कल फिर मिलना ही है, पर वो कल कभी आया ही नहीं। तब वो अधूरापन एक ऐसा बोझ बन जाता है जिसे ताउम्र ढोना पड़ता है। हमारी नब्बे प्रतिशत चिंताएं उन बातों के लिए होती हैं जो भविष्य में शायद कभी होंगी ही नहीं। हम उस अंधेरे से डरे हुए हैं जो अभी आया ही नहीं है और उस रोशनी को नजरअंदाज कर रहे हैं जो अभी हमारे सामने जल रही है।
ज़िंदगी को एक फिल्म की तरह देखिए, यह एक सिंगल टेक शॉट है जिसमें कोई री-टेक की गुंजाइश नहीं होती। अगर आज का सीन खराब हुआ, तो वह हमेशा के लिए फिल्म का हिस्सा बन गया। आप कल की शूटिंग में आज की गलती नहीं सुधार सकते। सुधार की गुंजाइश तभी तक है जब तक कागज़ हमारे सामने है। अगर कागज़ ही खत्म हो गया, तो इरेज़र किस काम का? 'कल किसने देखा है'—यह जुमला हमें डराने के लिए नहीं बनाया गया था, बल्कि यह हमें आज की कीमत समझाने के लिए था। यह हमें याद दिलाता है कि वह अधूरी किताब आज ही उठानी है, उस पुराने दोस्त को आज ही फोन करना है और उस इंसान से आज ही कह देना है कि वह हमारे लिए कितना मायने रखता है।
वक्त रेत की तरह है। आप मुट्ठी जितनी तेज़ भींचेंगे, रेत उतनी ही जल्दी उंगलियों के बीच से फिसल जाएगी। आर्यन और ज़ोया की कहानी ने हमें यही सिखाया कि कल एक उधार की ज़िंदगी है और हमें उसकी किश्तें आज के सुकून से चुकानी होती हैं। अगर आप इस वक्त इन शब्दों को पढ़ रहे हैं, तो बस एक लम्हे के लिए रुक जाइए। अपने चारों ओर की दुनिया को देखिए, उस हवा को महसूस कीजिए जो आपके चेहरे को छू रही है, उस शोर को सुनिए जो इस शहर की धड़कन है। यही सच है, यही मुकम्मल है। इसके बाद क्या होगा, यह न मुझे पता है, न आपको। क्योंकि सच तो यही है कि कल की कोख में क्या छिपा है, यह आज तक कोई नहीं जान पाया। अपनी ज़िंदगी को कल के भरोसे छोड़ना वैसा ही है जैसे किसी जलते हुए दीये को तूफ़ान की दया पर छोड़ देना। आज को जी लीजिए, आज को संवार लीजिए, कल अपनी फिक्र खुद कर लेगा।
1 comment:
Kal kisi ne ni dekha phir bhi kal ki chinta sabhi ko hai.keep it up author sahab
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