जानती हो,
जब तुमसे मिलूंगा न... तो गुलाब नहीं लाऊंगा।
मैं लाऊंगा तुम्हारे लिए एक गुलाब का पौधा।
तुम उसे अपनी खिड़की के
उस कोने में जगह देना
जहाँ से धूप छनकर आती हो।
उसे रोज़ सींचना, बिल्कुल वैसे ही
जैसे हम अपनी यादों को जतन से रखते हैं।
फिर एक सुबह जब उस पौधे की टहनी पर
कोई सुर्ख गुलाब मुस्कुराएगा,
समझ लेना कि मेरे आने का वक्त हो गया है।
तब मैं फिर आऊंगा तुम्हारे शहर, तुमसे मिलने।
और तब तुम उसी पौधे से एक फूल तोड़कर लाना...
वो गुलाब नहीं, हमारे सब्र और हमारे प्रेम की
जीती-जागती गवाही होगा।


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