एक बार गले लगा लो
मेरे मन के आंगन में
अब न चहचहाते हैं सपने
भावनाओं की शाखों से
झर चुके हैं सारे पत्ते
मेरे शब्दों की मिट्टी
बिना बारिश के सूख चली है
आशाओं की किरचियाँ
हर सांस में चुभने लगी हैं
हृदय की हर धड़कन
अब बस एक पुकार है
तेरे स्पर्श की गूंज
मौन में भी आकार है
तुम्हारी एक झप्पी
सर्द हवाओं में ओस सी लगे
जैसे बंजर ज़मीन पर
पहली बार बरसात जगे
तुम आओ तो
ये सूनी दीवारें बोल उठें
ये खामोश शामें
तेरी बातों में डोल उठें
प्रियतम,
बस एक बार गले लगा लो
इस टूटती चेतना में
थोड़ा जीवन जगा लो
मेरे अंदर का शून्य
तेरी ऊष्मा से भर जाएगा
जो अधूरा सा लगता हूं मैं
तेरे आलिंगन से संवर जाएगा
मुझे मेरी ही साँसों में
फिर से तुम लौटा दो
जो मरा सा जी रहा हूं
उसे जीना सिखा दो
बस एक बार
गले लगा लो
और फिर चाहे
कुछ न कहना, कुछ न लेना...
बस, मुझे फिर से "मैं" बना लो।
1 comment:
Aag laga di aag laga di
Post a Comment