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01/04/2026

दखल (थोड़ा सा इश्क़)


तुम्हारे आने से पहले,

यकीन मानो...

मेरी दिनचर्या में कोई 'खामी' नहीं थी,

सब कुछ वैसा ही था

जैसा एक मसरूफ शहर का होता है।


वक्त पर जागना,

वक्त पर सोना,

और बीच के सारे पहर

बड़ी मुस्तैदी से खर्च करना

दुनियादारी के हिसाब-किताब में।


मगर...

जब से तुमने मेरे ख्यालों में

जगह बनाई है,

एक अजीब सा 'दखल' महसूस होता है

मेरे सधे हुए वक्त में।


अब अक्सर ऐसा होता है,

कि चाय की प्याली

हाथ में धरी रह जाती है

और भाप ठंडी हो जाती है,

क्योंकि ठीक उसी वक्त

आंखों के सामने से गुज़रती है

तुम्हारी वह हल्की सी मुस्कुराहट।


किताब के पन्ने पलटते हुए

अचानक उंगलियाँ रुक जाती हैं

किसी ऐसे शब्द पर,

जो तुम्हारे नाम जैसा लगता है,

और फिर...

घंटों तक वह पन्ना पलटा नहीं जाता।


यह प्रेम नहीं है शायद,

यह तो मेरे 'वर्तमान' में

तुम्हारी यादों की 'साज़िश' है।


जो मुझे यह अहसास दिलाती है

कि मैं जिसे 'जीना' समझ रहा था,

वह महज सांसें लेना था,

ज़िंदगी तो अब शुरू हुई है—

इस मीठी सी अव्यवस्था के साथ।


हाँ, पहले मैं सिर्फ 'व्यस्त' था,

अब मैं... 'लापता' हूँ!



2 comments:

Anonymous said...

Nice yrr anirudh....💞

Ink By Golu said...

Thank you