भीतर ही भीतर जल रहा हूँ।
बीते लम्हों की कैद में,
वक्त की तरह निकल रहा हूँ।
मैं यादों के साये में चल रहा हूँ।
धुंधली सी उन राहों पर,
अक्सर मैं अब भटक रहा हूँ।
जो बातें अधूरी रह गईं,
उन्हीं में कहीं अटक रहा हूँ।
हर शाम मैं ढल रहा हूँ,
मैं यादों के साये में चल रहा हूँ।
चेहरे पर मुस्कान सजाकर,
दुनिया से अब मिल रहा हूँ।
पर सूखी हुई उस शाख सा,
बिना धूप के खिल रहा हूँ।
खुद को ही अब खल रहा हूँ,
मैं यादों के साये में चल रहा हूँ।

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