अभी तो खेल की पहली ही चाल थोड़ी है,
अभी से हार मान लेना कोई मिसाल थोड़ी है।
उठा के सिर ज़रा देखो बुलंदियों की तरफ़,
ये आसमान ही मंज़िल का जाल थोड़ी है।
खिंची है रेख जो माथे पे वो इबारत है,
हथेली की ये लकीरें ही हाल थोड़ी है।
नज़र चुरा के जो गुज़रे हैं आज पास से वो,
पुराने यार हैं, दुश्मन की ढाल थोड़ी है।
जिराग़ बन के जलना है तो हौसला रखो,
सिर्फ़ लौ का सुलगना ही कमाल थोड़ी है।
1 comment:
Awesome 👍👍👍
Post a Comment