Saturday, 15 November 2025

“बाल मेला” – बच्चों की कल्पनाओं, सीख और मुस्कान का अनोखा साप्ताहिक संगम

“बाल मेला” – बच्चों की कल्पनाओं, सीख और मुस्कान का अनोखा साप्ताहिक संगम

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बचपन… वो उम्र जब सपने रंगीन होते हैं और कल्पनाएं पंख लगाकर आसमान छूती हैं। बच्चों की इसी रंगीन दुनिया को और भी रचनात्मक, मज़ेदार और ज्ञानवर्धक बनाने के लिए Kalam ki Taqat लेकर आ रहा है एक अनोखी साप्ताहिक ई-मैगज़ीन “बाल मेला”
नाम ही बताता है—यह एक ऐसा मेला है जहाँ हर बच्चा अपनी रुचि की कोई न कोई चीज़ ज़रूर पाएगा।

आज के डिजिटल युग में जहाँ बच्चे मोबाइल की स्क्रीन पर उलझ कर रह जाते हैं, वहीं “बाल मेला” उन्हें देगी एक सकारात्मक, रचनात्मक और सुरक्षित डिजिटल दुनिया, जहाँ वे सीख भी पाएंगे और मुस्कुराएंगे भी।


क्यों खास है ‘बाल मेला’?

“बाल मेला” सिर्फ एक मैगज़ीन नहीं, बल्कि बच्चों के लिए एक पूरा मनोरंजन-उत्सव है।
हमारा उद्देश्य है बच्चों की कल्पनाशक्ति को बढ़ाना, रचनात्मकता को पंख देना, सोचने-समझने की क्षमता को मज़बूत करना और मनोरंजन के साथ सीखने का अवसर देना।

इस मैगज़ीन में हर सप्ताह बच्चों के लिए कुछ न कुछ नया, ताज़ा और मज़ेदार होगा।


मैगज़ीन की मुख्य विशेषताएं

1. बच्चों की कहानियां

हर सप्ताह नई-नई कहानियां—कभी जंगल के दोस्तों की, कभी साहस और ईमानदारी की, तो कभी रोमांच और रहस्य की।
उद्देश्य: बच्चों को कहानी के माध्यम से नैतिक मूल्य, समझ, संवेदनशीलता और रचनात्मक सोच प्रदान करना।


2. पहेली बूझो

जो दिमाग को गुदगुदाए और बच्चे को सोचने पर मजबूर करे।
“ऐसी कौन सी चीज़ है जो जितना बढ़ती है उतना ही कम दिखती है?”
ऐसी कई मज़ेदार पहेलियां हर सप्ताह बच्चों की बुद्धि को निखारने आएंगी।


3. बच्चों की कविताएं

बाल मन को सबसे ज़्यादा भाती हैं तुकबंदी और संगीतात्मक कविताएं।
हर सप्ताह प्यारी-प्यारी कविताएं—कभी फूलों पर, कभी मौसम पर, कभी दोस्ती पर—जो बच्चों की भाषा कौशल को मजबूत करेंगी।


4. दिमागी खेल (Brain Games)

पज़ल, Sudoku Kids Version, शब्द खोज (Word Search), डॉट्स जोड़ो, क्विक मैथ्स…
इससे बच्चों का IQ, तर्क शक्ति, और एकाग्रता बेहतर होगी।


5. ब्लॉग (Children’s Blog Section)

बच्चों को खुद के विचार व्यक्त करने का मौका।
एक ऐसा प्लेटफॉर्म जहाँ बच्चे अपना छोटा सा ब्लॉग लिख सकते हैं—
● अपनी छुट्टियों का अनुभव
● अपनी पसंदीदा किताब
● किसी त्योहार की याद
● या कोई भी मज़ेदार बात

यह सेक्शन बच्चों में लेखन कौशल को बढ़ावा देगा।


6. चुटकुले (Jokes Junction)

क्योंकि बच्चों की हंसी से प्यारी कोई आवाज़ नहीं।
हर सप्ताह ऐसे चुटकुले जो बच्चे दोस्तों और परिवार के साथ खुशी-खुशी साझा करें।


“बाल मेला” क्यों ज़रूरी है?

✔️ आज के बच्चे डिजिटल हैं—पर उन्हें सही प्रकार का डिजिटल कंटेंट चाहिए।
✔️ किताबों से दूर होते बच्चों को दोबारा पढ़ने की ओर आकर्षित करना।
✔️ माता-पिता के लिए एक सुरक्षित, गुणवत्ता-युक्त और शैक्षणिक विकल्प उपलब्ध कराना।
✔️ बच्चों के सर्वांगीण विकास में मदद करना—रचनात्मक, भाषाई, भावनात्मक और मानसिक विकास।

“बाल मेला” बच्चों की वही दुनिया बनाना चाहता है, जहाँ वे सीखें भी और खेलें भी।


Kalam ki Taqat का उद्देश्य

Kalam ki Taqat हमेशा से शब्दों की शक्ति और रचनात्मकता के माध्यम से समाज में सकारात्मकता लाने के लिए काम करता आया है।
“बाल मेला” उसी उद्देश्य को आगे बढ़ाने की दिशा में हमारा एक महत्वपूर्ण कदम है।

हम चाहते हैं कि हर बच्चा—चाहे शहर का हो या गाँव का—डिजिटल माध्यम में भी सीखने और आगे बढ़ने के बेहतरीन अवसर पाए।


आप भी जुड़ें ‘बाल मेला’ से

● अपने बच्चों के लिए इसे सब्सक्राइब करें
● बच्चों को अपनी कहानी, कविता, ड्रॉइंग या ब्लॉग भेजने के लिए प्रेरित करें
● इसे स्कूलों, टीचर्स और पैरेंट्स तक पहुँचाएँ

क्योंकि जब बच्चे सीखेंगे, मुस्कुराएंगे, और सपने देखेंगे—तभी भविष्य मजबूत होगा।


अंत में…

“बाल मेला” सिर्फ एक मैगज़ीन नहीं,
यह बचपन का उत्सव,
कल्पना का संसार,
और सीख का रंगीन पुल है।

Kalam ki Taqat आपको और आपके बच्चों का इस नए सफर में स्वागत करता है।
आइए, मिलकर बच्चों की दुनिया को और सुंदर बनाएं।


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Friday, 26 September 2025

गांव और नवरात्रि



🌺 नवरात्रिमय गांव 🌺
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नवरात्र का महीना है। गांव की चौपाल, गली-कूचे, मंदिर और मेला—सब एक अलग ही रंग में रंगे हुए हैं। जैसे ही मैं गांव पहुंचा, लगा मानो पूरा वातावरण मां दुर्गा के भक्ति रस में डूब गया हो।

हर ओर से गूंज रही आवाज़—
“श्री श्री काली माई दुर्गा पूजा समिति आप सभी ग्रामवासियों का हार्दिक अभिनंदन करती है और करती ही रहेगी।”

इसके साथ देवी मां के भजन, ढोल-नगाड़ों की थाप और शंखनाद पूरे गांव को और भी अधिक नवरात्रिमय बना रहे थे। सन्नाटा कहीं नहीं था, बल्कि हर कोना जीवन और उल्लास से भर गया था।

गांव के कुछ युवा सदस्य घर-घर जाकर पूजा का चंदा बटोर रहे थे। उनके उत्साह में सेवा भाव साफ झलकता था। मेले में दुकानों की चहल-पहल, गुब्बारों की उड़ान, बच्चों की खिलखिलाहट—सब मिलकर गांव को एक त्यौहार की धरती बना रहे थे।

मैं अपने कदमों को थामे गांव के तीन मुहान से घर की ओर चला। रास्ते में विजय चाचा दिखे—सिर पर गमछा, हाथ में खंती। उनकी चाल हमेशा की तरह धीमी मगर सधी हुई। शायद खेतों की ओर जा रहे हों, या फिर यूं ही अपनी मिट्टी का हालचाल लेने निकले हों।

घर के मड़ई में मेरी गाय बंधी थी। मड़ई की छांव तले खड़ी उसकी आंखें जैसे कह रही हों—“मुझे ये बंधन क्यों?” लेकिन फिर भी वह शांति से खड़ी थी। उसके पास से गुजरते हुए लगा जैसे गांव की आत्मा ही मुझे देख रही हो।

 बगान में नेनुआ और लौकी की बेलें लहराती थीं। उन पर खिले फूल हवा में ऐसी सुगंध घोल रहे थे, जो मन को भक्ति और श्रृंगार दोनों रस में डुबो दे। तितलियां उन फूलों पर जैसे रंग भर रही थीं, मानो गांव का श्रृंगार स्वयं प्रकृति कर रही हो।

अचानक, छोटकी बहन दौड़ती आई। आकर मेरे पैर छुए और बोली, “प्रणाम भैया।”
उसके हाथ में लौटनी थी, जल की बूंदें अब भी चमक रही थीं। चेहरे पर पूजा का तेज और आंखों में स्नेह देखकर क्षणभर को लगा—क्या सचमुच मैं किसी देवता से बढ़कर हूं? पर तुरंत मन ने टोका—नहीं, इंसान भगवान कैसे हो सकता है! शायद यह तो मेरे भावों की उड़ान थी।

और तभी मां दिखीं। मां रसोई में व्यस्त थीं। चेहरे पर वही सहजता, वही प्रेम। मां को देखना और उनका आशीर्वाद लेना मानो मेरे लिए नवरात्र की सबसे बड़ी पूजा हो।

कलम अब रुकना चाहती है। क्योंकि मां की ममता और गांव का नवरात्र—दोनों ही शब्दों से परे हैं।
आज इतना ही लिख पाता हूं। आगे कभी मन हुआ, तो इस श्रृंगारमय गांव की और बातें आपसे जरूर साझा करूंगा।


Monday, 1 September 2025

चल झूठी...!

"तुम कितना झूठ बोलती हो ना।"

"अब मैंने क्या कहा?"

"कुछ कहा ही तो नहीं।"

"मतलब?"

"कुछ नहीं, वापस कब आओगी?"

"कहो तो जाऊं ही ना?"

"मैं रोकुंगा तो रुक जाओगी?"

"रोक के देख लो।"

"रुक जाओ?

"ठीक है।"

"रुकना चाहती हो?"

"उम्म, हां।"

"फिर वही कहूं ?"

"क्या?"

"तुम कितना झूठ बोलती हो ना।"

Friday, 29 August 2025

ख्वाबों में खोया मैं...!


कहते हैं कि मोहब्बत तब सबसे सुंदर होती है जब वह अधूरी होती है।
जब वह किसी शब्द से नहीं, बल्कि आँखों की झलक, छोटी-सी मुस्कान और अनजाने इशारों से बयां होती है।
आज मैं अपने दिल की वही अधूरी दास्तान लिख रहा हूँ — एक इंस्टा स्टोरी के बहाने, जिसने मेरे भीतर कवि को फिर से जगा दिया।

सुबह इंस्टाग्राम खोला और उसकी स्टोरी देखी।
क्लिक किया और बस! मेरी आँखें जैसे ठहर गईं।

वो खड़ी थी, चेहरा हल्की-सी रोशनी में नहाया हुआ। काजल से सजी आँखें, जिनमें कहीं गहराई में रहस्य छिपे थे।
लेकिन तस्वीर सिर्फ उसकी नहीं थी। तस्वीर में उसका पूरा कमरा बोल रहा था —

  • दीवार पर घड़ी, जो उसकी हर धड़कन को समय में बांध रही थी।

  • कोने में रखा पांडा टेडी, जैसे उसका वफ़ादार साथी हो।

  • बिस्तर पर रखी उसकी डायरी, जो उसके दिल की हर बात लिखी जाती होगी।

  • खुली हुई खिड़की, जैसे उसके सपनों का दरवाज़ा।

  • बगल में रखी किताबें, जिनमें वह अपना संसार ढूँढती होगी।

  • कपड़ों से भरी अलमारी, जो उसकी सादगी और रंगीनियों का संगम थी।

  • और फिर वो खुद - उसकी निगाहें, उसका काजल, उसकी मासूम पर कातिल मुस्कान।

मैं उस तस्वीर को बस देखता ही रह गया।

देखते-देखते मेरे ख्यालों ने उड़ान भरी।
मैंने सोचा, अगर मैं उसके कमरे में मौजूद होता तो?
लेकिन मेरे ख्याल सीधे नहीं गए - उन्होंने मुझे उसकी हर चीज़ बनने पर मजबूर कर दिया।

काश मैं उसका आईना होता, ताकि वो रोज़ मुझमें झाँकती और मैं उसकी आँखों का संसार देखता।
काश मैं उसकी डायरी होता, ताकि वो अपने हर राज़, हर दर्द और हर सपने मुझे सौंप देती।
काश मैं उसकी घड़ी होता, ताकि हर पल उसकी नज़र मुझ पर रहती।
काश मैं उसका तकिया होता, ताकि उसकी थकान मेरी गोद में मिटती।
काश मैं उसका काजल होता, ताकि उसकी आँखों की शोभा का हिस्सा बन जाता। 

इन्हीं ख्यालों में डूबते-डूबते मेरी कल्पना कविता का रूप लेने लगी।

तेरी आँखों का आईना बन जाऊँ,
तेरी हर झलक में खो जाऊँ। तेरी पलकों की छाँव में रहकर, तेरे सपनों की राह सजाऊँ। तेरे चेहरे की रौशनी बनकर, तेरी मुस्कान में ढल जाऊँ। तेरे होंठों की हँसी में छुपकर, तेरे ग़मों को चुरा लाऊँ। तेरी साँसों की सरगम सुनकर, तेरे दिल का गीत गाऊँ। तेरी जुल्फ़ों की खुशबू बनकर, तेरे कंधों पर बिखर जाऊँ। तेरे तकिए की नरमी बनकर, तेरी थकान को सहलाऊँ। तेरे काजल की रेखा बनकर, तेरी आँखों में चमक बढ़ाऊँ। तेरी डायरी का पन्ना बनकर, तेरे दिल की कहानियाँ लिख पाऊँ। तेरे ख्वाबों की रात बनकर, तेरे ख़यालों में सदा ठहर जाऊँ। तेरे आँगन की हवा बनकर, तेरी जुल्फ़ों से खेल जाऊँ। तेरी घड़ी की सुई बनकर, तेरे हर पल का साथी बन जाऊँ। तेरे कमरे की खामोशी बनकर, तेरी तन्हाई में गुनगुनाऊँ। तेरे होंठों की सरगम बनकर, तेरी धड़कनों में सुर सजाऊँ। तेरे दुपट्टे की लहर बनकर, तेरी चाल में झूम जाऊँ। तेरी मुस्कान की चिंगारी बनकर, तेरे ग़मों को राख कर जाऊँ। तेरे बिस्तर की चादर बनकर, तेरे सपनों को ढँक जाऊँ। तेरी आँखों की नमी बनकर, तेरे आँसुओं में भी मुस्कराऊँ। तेरे दिल की धड़कन बनकर, तेरी मोहब्बत में सदा बहक जाऊँ।

मैं इन ख्वाबों की लहर में तैर ही रहा था कि अचानक देखा - वो स्टोरी डिलीट हो गई।
जैसे किसी ने मेरी धड़कनों से खेल लिया हो।

क्या उसने गलती से पोस्ट किया था?
क्या उसे डर था कि लोग क्या सोचेंगे?
या फिर - क्या वो सचमुच मेरे लिए थी?

दिल ने तो यही कहा - शायद वो जानती है कि मैं देखूँगा। शायद कहीं उसके दिल में भी मेरा नाम लिखा हो।

दोस्तों, मोहब्बत यही होती है।
जहाँ बाकी लोग कहेंगे कि "ये तो बस एक स्टोरी थी", वहीं एक आशिक उसे अपनी सबसे बड़ी कहानी बना देता है।

उसकी उस तस्वीर ने मुझे उसकी ज़िंदगी की गहराई दिखा दी।
उसकी हर चीज़ ने मुझसे कुछ कहा।
और जब उसने वो स्टोरी हटाई, तो मुझे लगा कि उसने कोई गुप्त संदेश भेजा है - सिर्फ मेरे लिए।

आज का दिन मेरे लिए साधारण नहीं था।
वो इंस्टा स्टोरी मेरे लिए कविता बन गई, उसकी हर चीज़ शृंगार रस की पंक्तियाँ बन गई।

क्या सचमुच वो मुझे सोच रही थी?
या फिर ये सब मेरी कल्पना है?
सच तो मुझे भी नहीं पता।

लेकिन एक बात तय है - जब तक मेरा दिल धड़कता रहेगा, ये मोहब्बत ज़िंदा रहेगी।
और जब तक मेरी कलम चलती रहेगी, ये भावनाएँ कविता बनकर बहती रहेंगी।


👉 दोस्तों, ये थी मेरी आज की दास्तान।
शायद आप सोचें कि मैं सिर्फ ख्वाबों में जी रहा हूँ। लेकिन सच कहूँ तो - प्यार की शुरुआत हमेशा ख्वाबों से ही होती है।और कभी-कभी ख्वाब ही सबसे हकीक़त वाली चीज़ लगते हैं।

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Sunday, 24 August 2025

ज़रूरी है क्या..? 💔

 ज़रूरी है क्या.. 💔



लबों तक जो बात आये,

हर वो बात करना ज़रूरी है क्या?

इश्क़ तो सबको हो जाता है,

ये बताओ इज़हार करना ज़रूरी है क्या?


फ़रिश्ता बन हज़ार ख़्वाब दिखाकर,

झूठे वादे करना ज़रूरी है क्या?

रिश्तेदारी तो सब जानते हैं,

ये बताओ सबको अपना कहना ज़रूरी है क्या?


बरसों पहले जो आईना टूटा था,

आज वापस जुड़ने लगे तो मुश्किल है क्या?

तुमने तो मोहब्बत का अंजाम देखा है,

ये बताओ दोबारा इश्क़ करना सही है क्या?


बेइंतहां न सही, इश्क़ मैंने भी किया था,

इसका भरोसा दिलाना ज़रूरी है क्या?

तुम जो रूठ जाते हो हर छोटी सी बात पर,

हर बार तुम्हें मनाना ज़रूरी है क्या?


सूरत नहीं, सिरत पूजता हूँ,

ऐसी बातें कहना ज़रूरी है क्या?

तुम्हारे बिन मैं एक पल नहीं जी सकता,

हर एक से ये कहना ज़रूरी है क्या?


दिल के जज़्बात आँखों से टपक पड़ें,

हर आंसू दिखाना ज़रूरी है क्या?

खामोशी भी तो एक जुबान होती है,

हर दर्द को बताना ज़रूरी है क्या?


मोहब्बत अगर सच्ची है दिल से,

तो सबूतों में तोलना ज़रूरी है क्या?

धड़कनों में तुम्हारा नाम बस जाए,

तो दुनिया को बताना ज़रूरी है क्या?


रिश्ते निभते हैं एहसास से,

हर बार क़सम खाना ज़रूरी है क्या?

अगर तुम समझते हो मेरी खामोशी,

तो लफ़्ज़ों में समझाना ज़रूरी है क्या?

Friday, 22 August 2025

अपनी बीबी/प्रेमिका से झगड़ा कैसे करें?

प्यार की कहानी हमेशा सीधी रेखा जैसी नहीं होती। कभी इसमें फूल होते हैं, तो कभी काँटे। कभी बातें मीठी लगती हैं, तो कभी वही बातें कड़वी हो जाती हैं। अक्सर लोग कहते हैं कि प्यार को निभाने के लिए समझदारी, भरोसा और मीठे शब्द चाहिए। लेकिन असल सच्चाई ये है कि रिश्तों की गहराई झगड़े से ही मापी जाती है। झगड़ा न हो तो रिश्ता अधूरा है। और हाँ, झगड़ा करना भी एक कला है। झगड़े का सही इस्तेमाल रिश्ते को मज़बूत बना देता है और गलत तरीके से किया गया झगड़ा रिश्ता तोड़ भी सकता है। तो आज हम इस कला को थोड़ा गंभीरता से और बहुत सारी हंसी-मज़ाक के साथ सीखेंगे।

 झगड़ा करने का पहला और आज़माया हुआ तरीका है बिना वजह सवाल पूछना। ये तरीका इतना आसान है कि हर प्रेमी को एक बार ज़रूर आज़माना चाहिए। लड़की फोन पर ज़रा देर से बोले, बस पूछ डालो: “इतनी देर क्यों लगा दी? किससे बात कर रही थी?” अगर उसने जवाब दिया कि “नहा रही थी”, तो आप कह सकते हैं: “इतनी देर नहाने में क्यों लग गई?” अगर बोली “माँ के पास थी”, तो तुरंत कह दो: “माँ के पास जाने में इतना राज़ क्यों छिपाना पड़ा?” देखिए, मामला कहाँ से कहाँ पहुँच जाएगा। ये बिना वजह सवाल रिश्ते की ज़मीन पर बारूद बिछाने जैसा है, जिसमें चिंगारी आपको खुद लगानी भी नहीं पड़ेगी। 

 लेकिन सिर्फ सवाल करना ही काफी नहीं है। खाने पर कमेंट करना भी एक बेहतरीन हथियार है। मान लो पत्नी ने प्यार से आपके लिए आलू के पराठे बनाए और आप बड़े आराम से कह दें: “ठीक है, लेकिन मम्मी जैसे स्वाद नहीं आए।” अब चाहे आपकी बीबी ने घंटों मेहनत की हो, उसका गुस्सा मिनटों में फूट पड़ेगा। गर्लफ्रेंड ने मैगी बनाई हो और आप कह दें: “लगता है नमक भूल गई हो”, तो यकीन मानिए उस मैगी का स्वाद आपके झगड़े की तीखी बहस में बदल जाएगा। और मज़े की बात ये है कि आप चुप रहकर भी इस झगड़े का आनंद ले सकते हैं क्योंकि खाने का जिक्र होते ही बहस अपने आप लंबी खिंचती चली जाती है। 

 अगर कभी लगे कि झगड़े के लिए नया टॉपिक नहीं मिल रहा, तो पुराने किस्से निकाल लेना चाहिए। पुराने झगड़े रिश्तों का खज़ाना होते हैं। “तुम्हें याद है 2019 में दिवाली के दिन क्या हुआ था?” या “तुम्हें वो दिन याद है जब तुम मुझे 45 मिनट लेट करवा दी थी?” ये बातें सुनते ही सामने वाली की आँखों में पुराना गुस्सा लौट आएगा और झगड़े की आग फिर से धधकने लगेगी। दरअसल, पुराने झगड़े रिश्तों में उतने ही काम आते हैं जितना पुराना मसाला, जिसकी खुशबू आज भी ताज़ा हो जाती है। 

 अब आती है उसकी पसंद पर तंज कसने की बारी। मान लीजिए वो रणवीर सिंह की दीवानी है। अब आप कह दीजिए: “ये लड़का हीरो है या कपड़े की दुकान? कभी लगता है शादी में बाराती से भी ज़्यादा चमकीले कपड़े पहन लेता है।” ये सुनते ही वो रणवीर की तारीफ़ पर उतर आएगी और आप उसकी बुराई पर अड़े रहेंगे। नतीजा—दोनों में बहस होगी और झगड़ा अपने आप तैयार हो जाएगा। यही तरीका किसी भी पसंद पर लागू किया जा सकता है—उसकी पसंदीदा किताब, उसकी मनपसंद वेब सीरीज़, यहाँ तक कि उसकी पसंदीदा चॉकलेट पर भी। 

 शॉपिंग पर तो झगड़े की इतनी गुंजाइश होती है कि उसपर पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है। वो मॉल से घंटे भर भटककर नई ड्रेस लेकर आएगी और आप कह दीजिए: “ये पिछली वाली जैसी ही लग रही है।” या फिर: “इतना पैसा खर्च कर दिया और कुछ खास नहीं दिख रहा।” अब चाहे ड्रेस पर कितना भी डिस्काउंट क्यों न मिला हो, उसकी नज़रों में आपने झगड़े का सिग्नल ऑन कर दिया है। और अगर आप थोड़े और चुभते शब्द बोलना चाहते हैं तो कहिए: “तुम्हें अभी तक शॉपिंग करना नहीं आया।” अब वो आपको पूरा फैशन शो दिखाकर साबित करेगी कि उसका चुनाव ही बेस्ट है। 

 डेट पर लेट पहुँचना भी झगड़े का शॉर्टकट है। उसने कहा 6 बजे आना और आप आराम से 6:45 पर पहुँच गए। जब वो गुस्से से बोलेगी तो आप बड़ी मासूमियत से कहिए: “ट्रैफिक बहुत था।” और अगर वो जवाब में बोले कि “तुम्हें पहले निकलना चाहिए था” तो तुरंत पलट दीजिए: “वैसे तुम तो लेट होने की आदी हो, आज मुझे लेट क्यों नहीं होने दिया?” अब देखिए, ये झगड़ा कितनी देर तक चलता है। 

 तारीफ में कंजूसी करना भी बड़ा असरदार तरीका है। जब वो दो घंटे सजने-संवरने में लगाए और आप कह दें—“ठीक लग रही हो”—तो ये सुनते ही उसके चेहरे की मुस्कान उड़ जाएगी। उसके लिए ये insult है और आपके लिए झगड़े का गेटपास। और अगर आपने थोड़ी और हिम्मत दिखा दी तो कह सकते हैं: “वैसे पिछली बार बेहतर लग रही थी।” अब तो युद्ध छिड़ना तय है। 

 सोशल मीडिया का युग झगड़े को और आसान बना देता है। उसने फेसबुक पर एक शायरी डाली—बस पूछो: “ये किसके लिए था?” इंस्टाग्राम पर उसकी फोटो पर हार्ट आया तो कहो: “इतना प्यार कौन कर रहा है?” अब वो चाहे जितनी सफाई दे, आपको बस शक जताते रहना है। झगड़ा अपने आप चलता रहेगा। 

 और हाँ, अगर ये सब भी कम पड़ जाए तो सबसे घातक हथियार है—उसकी सहेलियों का ज़िक्र। आप बस कह दीजिए: “तुम्हारी फ्रेंड पूजा मुझसे ज्यादा स्मार्ट है।” अब पूजा कितनी भी साधारण हो, आपकी प्रेमिका की नज़रों में वो अचानक खलनायिका बन जाएगी। अब देखिए, वो कैसे आपकी बातों को उलझाकर पूरे दिन का माहौल गर्म कर देती है। 

टीवी या वेब सीरीज़ भी झगड़े का अच्छा साधन है। उसे रोमांटिक मूवी देखनी हो और आप कहें: “नहीं, मुझे थ्रिलर देखना है।” वो बोले: “ये सीरीज़ बहुत अच्छी है”, तो आप कह दीजिए: “बकवास है।” अब आप दोनों की पसंद एक-दूसरे की दुश्मन बन चुकी है और आप झगड़े का सीधा आनंद उठा सकते हैं। 

 छुट्टी पर जाने का प्लान बनाना भी अक्सर झगड़े का कारण बनता है। वो कहे: “गोवा चलते हैं” और आप कहें: “नैनीताल अच्छा रहेगा।” अब कोई बीच चाहेगा और कोई पहाड़। बहस बढ़ती जाएगी और छुट्टी का प्लान बनते-बनते अधर में लटक जाएगा। मगर आपके पास झगड़े का नया किस्सा जुड़ जाएगा। 

 रिश्तेदारों पर हल्का-सा तंज कसना भी बड़े काम का तरीका है। आप कह सकते हैं: “तुम्हारी आंटी बहुत बोलती हैं” या “तुम्हारे भाई को तो कोई काम ही नहीं आता।” अब आपको रिश्तेदारी की पूरी लिस्ट सुनाई जाएगी और आप बीच-बीच में अपनी सफाई देते रहेंगे। झगड़ा चलता रहेगा और रिश्ते का मसाला भी बढ़ता रहेगा। 

 कभी उसकी आदतों पर ताना कसना भी बेहद असरदार होता है। “तुम्हें हमेशा देर होती है।” या “तुम सुनती ही नहीं हो।” ये बातें छोटी लगती हैं लेकिन असर गहरा होता है। वो समझेगी कि आप उसकी कमियाँ गिना रहे हैं और फिर बहस का माहौल गरम हो जाएगा। 

 और जब सारे हथियार फेल हो जाएँ तो साइलेंट ट्रीटमेंट सबसे खतरनाक तरीका है। जब वो कुछ पूछे तो आप बस हम्म कहें। या फिर बिल्कुल चुप रहें। ये खामोशी झगड़े को उस स्तर तक पहुँचा देती है जहाँ शब्दों से ज्यादा गुस्सा चेहरे पर दिखने लगता है। 

 तुलना करना तो रिश्तों में झगड़े का परमाणु बम है। आप बस कह दीजिए: “देखो शर्मा जी की बीवी कितनी समझदार है।” अब आपके घर में महाभारत शुरू हो चुका है। इस एक लाइन से आप घंटे भर का झगड़ा पक्का कर सकते हैं। 

 ईगो की चिंगारी भी बड़ी खतरनाक होती है। जब बहस हो रही हो तो हमेशा आखिरी लाइन आप ही बोलें। “मेरी बात मानो वरना…” भले ही “वरना” का कोई मतलब न हो, लेकिन झगड़ा लंबा खिंच जाएगा। और जब तक आपकी प्रेमिका ये साबित न कर दे कि उसकी बात सही है, झगड़ा चलता रहेगा। 

 छोटी-छोटी गलतियों को बड़ा बनाना भी एक कला है। अगर उसने पानी गिरा दिया तो कह दीजिए: “तुमसे कुछ संभलता ही नहीं।” ये एक लाइन छोटी गलती को पहाड़ बना देगी। अब वो साबित करने में जुट जाएगी कि वो सब कुछ संभाल सकती है और आप उसकी बात काटते रहेंगे। 

 “ना” कहना भी झगड़े का सीधा रास्ता है। वो कहे: “चलो बाहर चलते हैं।” आप कहें: “ना।” बस, अब प्रोग्राम तो रद्द हुआ ही, झगड़ा भी पक्का हो गया। 

 और अंत में, सबसे बड़ा हथियार—माफी न माँगना। गलती आपकी हो या न हो, माफी मांगना ही नहीं। बस कहिए: “मुझे क्यों सॉरी बोलना चाहिए?” ये एक लाइन झगड़े को अगले लेवल तक पहुँचा देती है। 

 अब सवाल ये है कि इतने सारे झगड़े करने के बाद रिश्ता कैसा रहेगा? तो जवाब है—बिल्कुल मज़ेदार। झगड़े अगर थोड़ी समझदारी से किए जाएँ, तो रिश्तों को और मजबूत बना देते हैं। ये रिश्तों में वो नमक हैं जो स्वाद को परफेक्ट करते हैं। याद रखिए, प्यार अगर रसगुल्ले जैसा मीठा है तो झगड़े वो समोसे की मिर्च हैं जो जीभ पर चुभती भी हैं और स्वाद भी देती हैं। 

 तो अगली बार जब भी लगे कि रिश्ता बहुत शांत हो गया है, तो ऊपर दिए गए तरीकों से थोड़ी-सी नोकझोंक छेड़ दीजिए। इससे न केवल आपका रिश्ता जीवंत रहेगा बल्कि आपके पास सुनाने के लिए हज़ारों किस्से भी होंगे।

Thursday, 14 August 2025

श्रृंगार में तुम !

वो जुल्फ़ें, वो काजल, वो चंचल निगाहें,
लुटा दें मोहब्बत, चुरा लें पनाहें।

वो झुमके, वो पायल की मीठी सी टनक,
मिटा दे दिलों की तमाम ही खनक।

वो होंठ गुलाबी, वो मीठी सी हँसी,
खिल उठे बहारें, महक जाए धरी।

गालों पे लाली, वो शरम का असर,
लगता है जैसे हो पहला सफ़र।

ओढ़नी से झांकता तेरा चेहरा गुलाल,
मानो सजे हो बसंती सा हाल।

तेरे कदमों की आहट, वो नरम सा चलन,
जगा दे हज़ारों हसीन सा सपन।

तेरा इठलाना, तेरी अदाओं का खेल,
बसा दे दिलों में मोहब्बत का मेल।

तेरी सांसों की खुशबू, वो नशा सा असर,
बना दे मुझे तेरा दीवाना मुखर।

शायर तो मैं पहले कभी था नहीं,
पर तुझको देखकर लफ़्ज़ थमते ही नहीं।

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Saturday, 12 July 2025

एक बार गले लगा लो..!

एक बार गले लगा लो


मेरे मन के आंगन में
अब न चहचहाते हैं सपने

भावनाओं की शाखों से
झर चुके हैं सारे पत्ते

मेरे शब्दों की मिट्टी
बिना बारिश के सूख चली है
आशाओं की किरचियाँ
हर सांस में चुभने लगी हैं

हृदय की हर धड़कन
अब बस एक पुकार है
तेरे स्पर्श की गूंज
मौन में भी आकार है

तुम्हारी एक झप्पी
सर्द हवाओं में ओस सी लगे
जैसे बंजर ज़मीन पर
पहली बार बरसात जगे

तुम आओ तो
ये सूनी दीवारें बोल उठें
ये खामोश शामें
तेरी बातों में डोल उठें

प्रियतम,
बस एक बार गले लगा लो
इस टूटती चेतना में
थोड़ा जीवन जगा लो

मेरे अंदर का शून्य
तेरी ऊष्मा से भर जाएगा
जो अधूरा सा लगता हूं मैं
तेरे आलिंगन से संवर जाएगा

मुझे मेरी ही साँसों में
फिर से तुम लौटा दो
जो मरा सा जी रहा हूं
उसे जीना सिखा दो

बस एक बार
गले लगा लो
और फिर चाहे
कुछ न कहना, कुछ न लेना...
बस, मुझे फिर से "मैं" बना लो।



Friday, 11 July 2025

वो शहर

वो शहर

✍️: गोलू कुमार गुप्ता 

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एक शहर था 
न देखा कभी, न जाना था,
न वहाँ की गलियों में
कोई मेरा ठिकाना था।

ना उसके मौसम में
मेरे ख्वाब पलते थे,
ना उसकी राहों में
मेरे कदम चलते थे।

वो बस एक नाम था —
नक़्शे पर लिखा हुआ,
ना कोई एहसास,
ना ही जज़्बातों से भरा हुआ।

मगर फिर आप मिली —
और कुछ तो बदला ज़रूर,
अब वो शहर
लगता है खुदा का नूर।

आपके होने से
वो शहर गुलज़ार हो गया,
हर कोना जैसे
आपके प्यार का इज़हार हो गया।

अब चाहूं मैं
उसी शहर में खो जाना,
आपकी धड़कनों के पास
एक झोपड़ी सा घर बना पाना।

जहां दीवारें भी
आपके नाम से गूंजें,
जहां हवाएं
आपकी खुशबू को सूंघें।

जहां सुबहें
आपके चेहरे की रौशनी से हो रोशन,
और रातें
आपके ख्वाबों में खोए हर क्षण।

जहां बारिश
आपके साथ भीगने की बात कहे,
और ठंडी हवा
आपके स्पर्श की सौगात बहे।

अब वो शहर
मुझे बसाने को बुलाता है,
आपके करीब आने का
हर दिन इक नया वादा कराता है।

कभी सोचा है आपने - 
आपके होने से
एक अनजान शहर भी
कितना प्यारा हो सकता है?

नहीं न?