Thursday, 8 January 2026

दूरी का भ्रम ( थोड़ा सा इश्क़ )

तुम्हारे न होने से,
सच कहूँ तो...
दुनिया के कामकाज में कोई फर्क नहीं पड़ा।
सूरज अब भी उसी वक्त निकलता है,
हवा अब भी उसी तरह बहती है,
और शहर का शोर भी
बिलकुल वैसा ही है।

सब कुछ... बेहद सामान्य है।

मगर मेरे भीतर,
एक 'अदृश्य' सा बदलाव आ गया है।
पहले, जब मैं कमरे में अकेला होता था,
तो उसे 'एकांत' कहता था,
मगर अब...
वही अकेलापन 'वीरानी' सा लगता है।

तुम्हें पता है?
अब मैं चीजों को सिर्फ देखता नहीं,
उन्हें तुम्हारी नज़र से तौलता हूँ।
कोई अच्छा दृश्य दिखे,
तो पहला ख्याल यही आता है कि
"काश! तुम भी इसे देख पातीं।"

यह अजीब विरोधाभास है 
कि भौतिक रूप से
तुम यहाँ से कोसों दूर हो,
मगर मानसिक रूप से 
तुमने मेरे भीतर इतनी जगह घेर ली है
कि मुझे अपने ही ख्यालों में
पांव रखने के लिए
तुम्हारी यादों से इजाज़त लेनी पड़ती है।

लोग कहते हैं कि दूरियों से
रिश्ते फीके पड़ जाते हैं,
मगर मेरा अनुभव अलग है।
तुम्हारी यह 'गैर-मौजूदगी'
मुझे हर पल
तुम्हारी 'मौजूदगी' का
और गहरा अहसास कराती है।

शायद...
प्रेम पास रहने का नाम नहीं,
बल्कि दूर रहकर भी
किसी को अपने भीतर
लगातार महसूस करने का नाम है।
......
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Tuesday, 6 January 2026

दखल (थोड़ा सा इश्क़)


तुम्हारे आने से पहले,

यकीन मानो...

मेरी दिनचर्या में कोई 'खामी' नहीं थी,

सब कुछ वैसा ही था

जैसा एक मसरूफ शहर का होता है।


वक्त पर जागना,

वक्त पर सोना,

और बीच के सारे पहर

बड़ी मुस्तैदी से खर्च करना

दुनियादारी के हिसाब-किताब में।


मगर...

जब से तुमने मेरे ख्यालों में

जगह बनाई है,

एक अजीब सा 'दखल' महसूस होता है

मेरे सधे हुए वक्त में।


अब अक्सर ऐसा होता है,

कि चाय की प्याली

हाथ में धरी रह जाती है

और भाप ठंडी हो जाती है,

क्योंकि ठीक उसी वक्त

आंखों के सामने से गुज़रती है

तुम्हारी वह हल्की सी मुस्कुराहट।


किताब के पन्ने पलटते हुए

अचानक उंगलियाँ रुक जाती हैं

किसी ऐसे शब्द पर,

जो तुम्हारे नाम जैसा लगता है,

और फिर...

घंटों तक वह पन्ना पलटा नहीं जाता।


यह प्रेम नहीं है शायद,

यह तो मेरे 'वर्तमान' में

तुम्हारी यादों की 'साज़िश' है।


जो मुझे यह अहसास दिलाती है

कि मैं जिसे 'जीना' समझ रहा था,

वह महज सांसें लेना था,

ज़िंदगी तो अब शुरू हुई है—

इस मीठी सी अव्यवस्था के साथ।


हाँ, पहले मैं सिर्फ 'व्यस्त' था,

अब मैं... 'लापता' हूँ!



Wednesday, 26 November 2025

तुमसे हसीं कोई नज़ारा नहीं मिला

तुमसे हसीं कोई नज़ारा नहीं मिला
_____________________________
तुमसे अच्छा कोई सहारा नहीं मिला ,
इस दरिया को कोई किनारा नहीं मिला ।

यूं तो आएं ज़िंदगी में समझदार लोग भी ,
मगर तुम जैसा कोई सितारा नहीं मिला ।

यूं तो हजार देखे मंजर इन आंखों ने ,
तुमसे हसीं कोई नजारा नहीं मिला ..!!

हर राह पर चलती रही ये ज़िंदगानी,
पर मंजिल कोई भी दोबारा नहीं मिला ।

लाख कोशिशें की इन लबों ने मुस्कुराने की,
मगर तेरे बिन कोई इशारा नहीं मिला ।

ढूंढा मैंने इस जहाँ के हर कोने में,
पर कोई वजूद इतना प्यारा नहीं मिला ।

यूँ तो महफ़िलें सजीं हर रोज़ रोशनियों से,
मगर तेरी आँख जैसा उजियारा नहीं मिला ।

भीड़ में खोया रहा दिल, पुकारता रहा नाम तेरा,
इस भीड़ में कोई गवारा नहीं मिला ।

यूँ तो दौलत और शोहरत की कमी न हुई,
पर तेरे प्यार सा कोई खजाना नहीं मिला ।

कई साज़ बजे, कई राग अलापे गए,
मगर तेरी धड़कन सा कोई नगाड़ा नहीं मिला ।

देखा है मैंने हर रिश्ते को टूटते-बनते,
पर तेरे साथ जैसा कोई किनारा नहीं मिला ।

बहुत बातें की लोगों ने, ज्ञान की, प्रेम की,
पर तेरी खामोशी सा कोई सहारा नहीं मिला ।

हाँ, तेरी परछाई से ही है इस दिल की रौनक,
तुझसे दूर जाकर कोई गुजारा नहीं मिला ।

बस एक तू ही है जो मेरे हर दर्द की दवा है,
तेरे अलावा कोई हमारा नहीं मिला ।

यह जीवन भी अब तेरे नाम कर दिया है,
अब जीने का और कोई सहारा नहीं मिला ।

Monday, 24 November 2025

पहुंच से बाहर

मैंने दुनिया नाप ली,
पहाड़ों के
शिखरों तक पहुँच गया,
उन ऊँचे, बर्फीले
ताज को छू लिया,
जहाँ बादलों का डेरा था।

समुद्र के तल को
देख आया,
गहरे, अथाह नीलेपन में
डूब कर,
मोतियों की खान को
ढूंढ लिया,
अंधेरे की चुप्पी को
सुन आया,
जलजले की लहरों को
गले लगाया।

नदियों के आखिरी छोर
तक पहुँच गया,
उनके उद्गम के रहस्य को
पहचान लिया,
उनके बहाव की गति को
महसूस किया,
हर मोड़ पर प्रकृति के
इशारे को समझा।

मैंने इतिहास के पन्ने
पलट कर देखे,
हर सभ्यता की नींव
को टटोल लिया,
समय की धूल में दबे
राज्यों को जान लिया,
अतीत के हर किस्से को
जीकर आया।

ब्रह्माण्ड के तारों को
गिना है मैंने,
हर ग्रह की कक्षा में
झाँक लिया,
विज्ञान की प्रयोगशाला में
हर सूत्र को हल किया,
जीवन के जटिल सवालों
का जवाब दिया।

मैंने हर यात्रा
पूरी कर ली,
हर मुकाम
हासिल कर लिया,
हर बाधा
पार कर ली,
किन्तु,

“किन्तु मैं नहीं पहुँच
पाया तुम्हारे
'हृदय' तक...!!"

Sunday, 23 November 2025

बस कुछ और पल


बस कुछ और पल...

फिर यह पल भी ढल जाना है।

जो ठहरा लगता है आज,

उसका भी आगे निकल जाना है।


​जो बीते दिन हैं,

बस यादों में ही सुलझ रहे,

उनको धुंधला ही हो जाना है।

बस कुछ और पल...


​जो जीवन की डगर है,

रुकती नहीं, बहती जाती है,

उसको गंतव्य पर पहुंच जाना है।

बस कुछ और पल...


​जो हर श्वास है आती-जाती,

जैसे हवा का झोंका हो कोई,

उसको थम कर ठहर जाना है।

बस कुछ और पल...


​जो उम्मीदें हैं पनपती,

हर रोज नए ख्वाबों की तरह,

उनको स्वप्न ही बन रह जाना है।

बस कुछ और पल...


​जो कल की आहट है,

आज को लीलने को आतुर,

जरा-जरा उसको अतीत हो जाना है।

बस कुछ और पल...


जो रिश्तों की तपिश है,

दिल में धड़कती मौन सी आग,

उसे भी राख बन मिट जाना है।

बस कुछ और पल…


जो मुस्कानों का कारवां है,

आँसुओं की गलियों से गुज़रता,

उसे भी ख़ामोश रात बन जाना है।

बस कुछ और पल…


फिर सब धुंधला, सब फीका,

सिर्फ़ हवाओं में नाम रह जाएंगे,

जो आज है, वो कल कहानी बन जाना है।

बस कुछ और पल…

.....

लेखक: गोलू कुमार गुप्ता

.....

Saturday, 22 November 2025

किसी और की..!


तू ख्वाब थी जो आँखों में,

अब सच्चाई है किसी और की।


जिस दिल की तू धड़कन थी,

अब धड़कन है किसी और की।


मेरी तन्हा सी रातों में,

अब रौशनी है किसी और की।


जिस राह पे तुझे माँगा था,

अब मंज़िल है किसी और की।


तेरे बिना जो अधूरा था,

अब कहानी है किसी और की।


जिस पल में तेरी यादें थीं,

अब वह घड़ी है किसी और की।


मैं जिस गीत में डूबा था,

अब वो धुन है किसी और की।


जो मुस्कान थी होंठों पे,

अब वो हँसी है किसी और की।


तेरे बिना जो वीरान था,

अब वो बस्ती है किसी और की।


जिस छाँव में सुकून मिला,

अब वो छाया है किसी और की।


तेरे नाम पे जो जिया करता,

अब ज़िंदगी है किसी और की।


तेरा हर एक इशारा था,

अब बंदगी है किसी और की।


जिस स्पर्श से दिल महका था,

अब वो खुशबू है किसी और की।


जो लहरें थीं मेरी साँसों की,

अब वो नदी है किसी और की।


तेरे लिए जो अश्क बहे,

अब वो नमी है किसी और की।


मैं रोया तेरे ख्वाबों में,

अब वो नींद है किसी और की।


जिस आँगन में तेरा नाम लिखा,

अब वो चौखट है किसी और की।


जिस रंग से तू रंगी थी,

अब वो होली है किसी और की।


तेरे लिए जो दिल धड़का,

अब वो धड़कन है किसी और की।


तू प्यार थी जो मेरा कभी,

अब चाहत है किसी और की।

- गोलू कुमार गुप्ता

Friday, 21 November 2025

मैं हार गया..!


कहता हूँ…

सब ठीक है।

पर सच ये है…

कुछ भी ठीक नहीं है।


जिस दिन तुम गई…

उस दिन सिर्फ़ तुम नहीं गईं,

कुछ मेरा भी चला गया।

और जो बचा है…

वो मैं नहीं हूँ।


मैं हार गया हूँ।

हाँ…

सीधे, साफ़, बिना बहस....

मैं हार गया हूँ।


कभी सोचा था…

मोहब्बत संभाल लूँगा,

रिश्ता बचा लूँगा,

पर देखो....

तुम चली गईं

और मैं… वहीं का वहीं रह गया।


हा, हा, हा, हा 😅😅

मजेदार है ना?

तुम चल दीं,

और मेरी दुनिया रुक गई।


वो मोड़…

जहाँ तुमने हाथ छोड़ा था,

तब समझ नहीं आया....

तुम्हारा हाथ छूटा था,

या मेरा वजूद।


उस रात चिराग बुझा नहीं था,

बस....

आख़िरी बार लौ काँपी थी।

और फिर ख़ामोशी उतर आई....

सीधी दिल में।

ठंडी।

पत्थर जैसी।


अब शहर शोर करता है,

पर भीतर सब सन्नाटा है।

लोग चलते हैं, हँसते हैं,

और मैं…

बस देखता हूँ।

बिना महसूस किए।


तुमसे शिकवा नहीं।

तुम्हें हक़ था जाने का।

शिकायत बस खुद से है....

क्यों सोचा था,

कि तुम… ठहरोगी?


रिश्ते की जो डोर थी…

कहते हैं वो टूट गई....

झूठ।

डोर नहीं टूटी…

मैं टूटा हूँ।


अब सपने नहीं आते,

इच्छाएँ नहीं जगतीं,

और दिल…

दिल अब सिर्फ़ धड़कता है,

जीता नहीं।


तो हाँ…

आज पहली बार मान रहा हूँ....

सब खत्म।


तुम।

हम।

और वो मैं....

जो प्यार करता था।


अब बस एक ठंडी सच्चाई बची है.....

मैं हार चुका हूँ।

और तुम्हारा जाना ही

मेरी कहानी का आख़िरी वाक्य था।


हां, मैं हार गया हूं।

हां, मैं हार गया हूं।

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Saturday, 15 November 2025

“बाल मेला” – बच्चों की कल्पनाओं, सीख और मुस्कान का अनोखा साप्ताहिक संगम

“बाल मेला” – बच्चों की कल्पनाओं, सीख और मुस्कान का अनोखा साप्ताहिक संगम

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बचपन… वो उम्र जब सपने रंगीन होते हैं और कल्पनाएं पंख लगाकर आसमान छूती हैं। बच्चों की इसी रंगीन दुनिया को और भी रचनात्मक, मज़ेदार और ज्ञानवर्धक बनाने के लिए Kalam ki Taqat लेकर आ रहा है एक अनोखी साप्ताहिक ई-मैगज़ीन “बाल मेला”
नाम ही बताता है—यह एक ऐसा मेला है जहाँ हर बच्चा अपनी रुचि की कोई न कोई चीज़ ज़रूर पाएगा।

आज के डिजिटल युग में जहाँ बच्चे मोबाइल की स्क्रीन पर उलझ कर रह जाते हैं, वहीं “बाल मेला” उन्हें देगी एक सकारात्मक, रचनात्मक और सुरक्षित डिजिटल दुनिया, जहाँ वे सीख भी पाएंगे और मुस्कुराएंगे भी।


क्यों खास है ‘बाल मेला’?

“बाल मेला” सिर्फ एक मैगज़ीन नहीं, बल्कि बच्चों के लिए एक पूरा मनोरंजन-उत्सव है।
हमारा उद्देश्य है बच्चों की कल्पनाशक्ति को बढ़ाना, रचनात्मकता को पंख देना, सोचने-समझने की क्षमता को मज़बूत करना और मनोरंजन के साथ सीखने का अवसर देना।

इस मैगज़ीन में हर सप्ताह बच्चों के लिए कुछ न कुछ नया, ताज़ा और मज़ेदार होगा।


मैगज़ीन की मुख्य विशेषताएं

1. बच्चों की कहानियां

हर सप्ताह नई-नई कहानियां—कभी जंगल के दोस्तों की, कभी साहस और ईमानदारी की, तो कभी रोमांच और रहस्य की।
उद्देश्य: बच्चों को कहानी के माध्यम से नैतिक मूल्य, समझ, संवेदनशीलता और रचनात्मक सोच प्रदान करना।


2. पहेली बूझो

जो दिमाग को गुदगुदाए और बच्चे को सोचने पर मजबूर करे।
“ऐसी कौन सी चीज़ है जो जितना बढ़ती है उतना ही कम दिखती है?”
ऐसी कई मज़ेदार पहेलियां हर सप्ताह बच्चों की बुद्धि को निखारने आएंगी।


3. बच्चों की कविताएं

बाल मन को सबसे ज़्यादा भाती हैं तुकबंदी और संगीतात्मक कविताएं।
हर सप्ताह प्यारी-प्यारी कविताएं—कभी फूलों पर, कभी मौसम पर, कभी दोस्ती पर—जो बच्चों की भाषा कौशल को मजबूत करेंगी।


4. दिमागी खेल (Brain Games)

पज़ल, Sudoku Kids Version, शब्द खोज (Word Search), डॉट्स जोड़ो, क्विक मैथ्स…
इससे बच्चों का IQ, तर्क शक्ति, और एकाग्रता बेहतर होगी।


5. ब्लॉग (Children’s Blog Section)

बच्चों को खुद के विचार व्यक्त करने का मौका।
एक ऐसा प्लेटफॉर्म जहाँ बच्चे अपना छोटा सा ब्लॉग लिख सकते हैं—
● अपनी छुट्टियों का अनुभव
● अपनी पसंदीदा किताब
● किसी त्योहार की याद
● या कोई भी मज़ेदार बात

यह सेक्शन बच्चों में लेखन कौशल को बढ़ावा देगा।


6. चुटकुले (Jokes Junction)

क्योंकि बच्चों की हंसी से प्यारी कोई आवाज़ नहीं।
हर सप्ताह ऐसे चुटकुले जो बच्चे दोस्तों और परिवार के साथ खुशी-खुशी साझा करें।


“बाल मेला” क्यों ज़रूरी है?

✔️ आज के बच्चे डिजिटल हैं—पर उन्हें सही प्रकार का डिजिटल कंटेंट चाहिए।
✔️ किताबों से दूर होते बच्चों को दोबारा पढ़ने की ओर आकर्षित करना।
✔️ माता-पिता के लिए एक सुरक्षित, गुणवत्ता-युक्त और शैक्षणिक विकल्प उपलब्ध कराना।
✔️ बच्चों के सर्वांगीण विकास में मदद करना—रचनात्मक, भाषाई, भावनात्मक और मानसिक विकास।

“बाल मेला” बच्चों की वही दुनिया बनाना चाहता है, जहाँ वे सीखें भी और खेलें भी।


Kalam ki Taqat का उद्देश्य

Kalam ki Taqat हमेशा से शब्दों की शक्ति और रचनात्मकता के माध्यम से समाज में सकारात्मकता लाने के लिए काम करता आया है।
“बाल मेला” उसी उद्देश्य को आगे बढ़ाने की दिशा में हमारा एक महत्वपूर्ण कदम है।

हम चाहते हैं कि हर बच्चा—चाहे शहर का हो या गाँव का—डिजिटल माध्यम में भी सीखने और आगे बढ़ने के बेहतरीन अवसर पाए।


आप भी जुड़ें ‘बाल मेला’ से

● अपने बच्चों के लिए इसे सब्सक्राइब करें
● बच्चों को अपनी कहानी, कविता, ड्रॉइंग या ब्लॉग भेजने के लिए प्रेरित करें
● इसे स्कूलों, टीचर्स और पैरेंट्स तक पहुँचाएँ

क्योंकि जब बच्चे सीखेंगे, मुस्कुराएंगे, और सपने देखेंगे—तभी भविष्य मजबूत होगा।


अंत में…

“बाल मेला” सिर्फ एक मैगज़ीन नहीं,
यह बचपन का उत्सव,
कल्पना का संसार,
और सीख का रंगीन पुल है।

Kalam ki Taqat आपको और आपके बच्चों का इस नए सफर में स्वागत करता है।
आइए, मिलकर बच्चों की दुनिया को और सुंदर बनाएं।


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Friday, 26 September 2025

गांव और नवरात्रि



🌺 नवरात्रिमय गांव 🌺
___________________
नवरात्र का महीना है। गांव की चौपाल, गली-कूचे, मंदिर और मेला—सब एक अलग ही रंग में रंगे हुए हैं। जैसे ही मैं गांव पहुंचा, लगा मानो पूरा वातावरण मां दुर्गा के भक्ति रस में डूब गया हो।

हर ओर से गूंज रही आवाज़—
“श्री श्री काली माई दुर्गा पूजा समिति आप सभी ग्रामवासियों का हार्दिक अभिनंदन करती है और करती ही रहेगी।”

इसके साथ देवी मां के भजन, ढोल-नगाड़ों की थाप और शंखनाद पूरे गांव को और भी अधिक नवरात्रिमय बना रहे थे। सन्नाटा कहीं नहीं था, बल्कि हर कोना जीवन और उल्लास से भर गया था।

गांव के कुछ युवा सदस्य घर-घर जाकर पूजा का चंदा बटोर रहे थे। उनके उत्साह में सेवा भाव साफ झलकता था। मेले में दुकानों की चहल-पहल, गुब्बारों की उड़ान, बच्चों की खिलखिलाहट—सब मिलकर गांव को एक त्यौहार की धरती बना रहे थे।

मैं अपने कदमों को थामे गांव के तीन मुहान से घर की ओर चला। रास्ते में विजय चाचा दिखे—सिर पर गमछा, हाथ में खंती। उनकी चाल हमेशा की तरह धीमी मगर सधी हुई। शायद खेतों की ओर जा रहे हों, या फिर यूं ही अपनी मिट्टी का हालचाल लेने निकले हों।

घर के मड़ई में मेरी गाय बंधी थी। मड़ई की छांव तले खड़ी उसकी आंखें जैसे कह रही हों—“मुझे ये बंधन क्यों?” लेकिन फिर भी वह शांति से खड़ी थी। उसके पास से गुजरते हुए लगा जैसे गांव की आत्मा ही मुझे देख रही हो।

 बगान में नेनुआ और लौकी की बेलें लहराती थीं। उन पर खिले फूल हवा में ऐसी सुगंध घोल रहे थे, जो मन को भक्ति और श्रृंगार दोनों रस में डुबो दे। तितलियां उन फूलों पर जैसे रंग भर रही थीं, मानो गांव का श्रृंगार स्वयं प्रकृति कर रही हो।

अचानक, छोटकी बहन दौड़ती आई। आकर मेरे पैर छुए और बोली, “प्रणाम भैया।”
उसके हाथ में लौटनी थी, जल की बूंदें अब भी चमक रही थीं। चेहरे पर पूजा का तेज और आंखों में स्नेह देखकर क्षणभर को लगा—क्या सचमुच मैं किसी देवता से बढ़कर हूं? पर तुरंत मन ने टोका—नहीं, इंसान भगवान कैसे हो सकता है! शायद यह तो मेरे भावों की उड़ान थी।

और तभी मां दिखीं। मां रसोई में व्यस्त थीं। चेहरे पर वही सहजता, वही प्रेम। मां को देखना और उनका आशीर्वाद लेना मानो मेरे लिए नवरात्र की सबसे बड़ी पूजा हो।

कलम अब रुकना चाहती है। क्योंकि मां की ममता और गांव का नवरात्र—दोनों ही शब्दों से परे हैं।
आज इतना ही लिख पाता हूं। आगे कभी मन हुआ, तो इस श्रृंगारमय गांव की और बातें आपसे जरूर साझा करूंगा।


Monday, 1 September 2025

चल झूठी...!

"तुम कितना झूठ बोलती हो ना।"

"अब मैंने क्या कहा?"

"कुछ कहा ही तो नहीं।"

"मतलब?"

"कुछ नहीं, वापस कब आओगी?"

"कहो तो जाऊं ही ना?"

"मैं रोकुंगा तो रुक जाओगी?"

"रोक के देख लो।"

"रुक जाओ?

"ठीक है।"

"रुकना चाहती हो?"

"उम्म, हां।"

"फिर वही कहूं ?"

"क्या?"

"तुम कितना झूठ बोलती हो ना।"