Sunday, 8 March 2026
डिजिटल सन्नाटा: भीड़ में खोती मानवीय संवेदनाएँ
Monday, 23 February 2026
वो जो घाट बन गए
Saturday, 17 January 2026
माफ़ी का रंग
Thursday, 8 January 2026
दूरी का भ्रम ( थोड़ा सा इश्क़ )
Tuesday, 6 January 2026
दखल (थोड़ा सा इश्क़)
तुम्हारे आने से पहले,
यकीन मानो...
मेरी दिनचर्या में कोई 'खामी' नहीं थी,
सब कुछ वैसा ही था
जैसा एक मसरूफ शहर का होता है।
वक्त पर जागना,
वक्त पर सोना,
और बीच के सारे पहर
बड़ी मुस्तैदी से खर्च करना
दुनियादारी के हिसाब-किताब में।
मगर...
जब से तुमने मेरे ख्यालों में
जगह बनाई है,
एक अजीब सा 'दखल' महसूस होता है
मेरे सधे हुए वक्त में।
अब अक्सर ऐसा होता है,
कि चाय की प्याली
हाथ में धरी रह जाती है
और भाप ठंडी हो जाती है,
क्योंकि ठीक उसी वक्त
आंखों के सामने से गुज़रती है
तुम्हारी वह हल्की सी मुस्कुराहट।
किताब के पन्ने पलटते हुए
अचानक उंगलियाँ रुक जाती हैं
किसी ऐसे शब्द पर,
जो तुम्हारे नाम जैसा लगता है,
और फिर...
घंटों तक वह पन्ना पलटा नहीं जाता।
यह प्रेम नहीं है शायद,
यह तो मेरे 'वर्तमान' में
तुम्हारी यादों की 'साज़िश' है।
जो मुझे यह अहसास दिलाती है
कि मैं जिसे 'जीना' समझ रहा था,
वह महज सांसें लेना था,
ज़िंदगी तो अब शुरू हुई है—
इस मीठी सी अव्यवस्था के साथ।
हाँ, पहले मैं सिर्फ 'व्यस्त' था,
अब मैं... 'लापता' हूँ!
Wednesday, 26 November 2025
तुमसे हसीं कोई नज़ारा नहीं मिला
Monday, 24 November 2025
पहुंच से बाहर
Sunday, 23 November 2025
बस कुछ और पल
बस कुछ और पल...
फिर यह पल भी ढल जाना है।
जो ठहरा लगता है आज,
उसका भी आगे निकल जाना है।
जो बीते दिन हैं,
बस यादों में ही सुलझ रहे,
उनको धुंधला ही हो जाना है।
बस कुछ और पल...
जो जीवन की डगर है,
रुकती नहीं, बहती जाती है,
उसको गंतव्य पर पहुंच जाना है।
बस कुछ और पल...
जो हर श्वास है आती-जाती,
जैसे हवा का झोंका हो कोई,
उसको थम कर ठहर जाना है।
बस कुछ और पल...
जो उम्मीदें हैं पनपती,
हर रोज नए ख्वाबों की तरह,
उनको स्वप्न ही बन रह जाना है।
बस कुछ और पल...
जो कल की आहट है,
आज को लीलने को आतुर,
जरा-जरा उसको अतीत हो जाना है।
बस कुछ और पल...
जो रिश्तों की तपिश है,
दिल में धड़कती मौन सी आग,
उसे भी राख बन मिट जाना है।
बस कुछ और पल…
जो मुस्कानों का कारवां है,
आँसुओं की गलियों से गुज़रता,
उसे भी ख़ामोश रात बन जाना है।
बस कुछ और पल…
फिर सब धुंधला, सब फीका,
सिर्फ़ हवाओं में नाम रह जाएंगे,
जो आज है, वो कल कहानी बन जाना है।
बस कुछ और पल…
.....
लेखक: गोलू कुमार गुप्ता
.....
Saturday, 22 November 2025
किसी और की..!
तू ख्वाब थी जो आँखों में,
अब सच्चाई है किसी और की।
जिस दिल की तू धड़कन थी,
अब धड़कन है किसी और की।
मेरी तन्हा सी रातों में,
अब रौशनी है किसी और की।
जिस राह पे तुझे माँगा था,
अब मंज़िल है किसी और की।
तेरे बिना जो अधूरा था,
अब कहानी है किसी और की।
जिस पल में तेरी यादें थीं,
अब वह घड़ी है किसी और की।
मैं जिस गीत में डूबा था,
अब वो धुन है किसी और की।
जो मुस्कान थी होंठों पे,
अब वो हँसी है किसी और की।
तेरे बिना जो वीरान था,
अब वो बस्ती है किसी और की।
जिस छाँव में सुकून मिला,
अब वो छाया है किसी और की।
तेरे नाम पे जो जिया करता,
अब ज़िंदगी है किसी और की।
तेरा हर एक इशारा था,
अब बंदगी है किसी और की।
जिस स्पर्श से दिल महका था,
अब वो खुशबू है किसी और की।
जो लहरें थीं मेरी साँसों की,
अब वो नदी है किसी और की।
तेरे लिए जो अश्क बहे,
अब वो नमी है किसी और की।
मैं रोया तेरे ख्वाबों में,
अब वो नींद है किसी और की।
जिस आँगन में तेरा नाम लिखा,
अब वो चौखट है किसी और की।
जिस रंग से तू रंगी थी,
अब वो होली है किसी और की।
तेरे लिए जो दिल धड़का,
अब वो धड़कन है किसी और की।
तू प्यार थी जो मेरा कभी,
अब चाहत है किसी और की।
- गोलू कुमार गुप्ता
Friday, 21 November 2025
मैं हार गया..!
कहता हूँ…
सब ठीक है।
पर सच ये है…
कुछ भी ठीक नहीं है।
जिस दिन तुम गई…
उस दिन सिर्फ़ तुम नहीं गईं,
कुछ मेरा भी चला गया।
और जो बचा है…
वो मैं नहीं हूँ।
मैं हार गया हूँ।
हाँ…
सीधे, साफ़, बिना बहस....
मैं हार गया हूँ।
कभी सोचा था…
मोहब्बत संभाल लूँगा,
रिश्ता बचा लूँगा,
पर देखो....
तुम चली गईं
और मैं… वहीं का वहीं रह गया।
हा, हा, हा, हा 😅😅
मजेदार है ना?
तुम चल दीं,
और मेरी दुनिया रुक गई।
वो मोड़…
जहाँ तुमने हाथ छोड़ा था,
तब समझ नहीं आया....
तुम्हारा हाथ छूटा था,
या मेरा वजूद।
उस रात चिराग बुझा नहीं था,
बस....
आख़िरी बार लौ काँपी थी।
और फिर ख़ामोशी उतर आई....
सीधी दिल में।
ठंडी।
पत्थर जैसी।
अब शहर शोर करता है,
पर भीतर सब सन्नाटा है।
लोग चलते हैं, हँसते हैं,
और मैं…
बस देखता हूँ।
बिना महसूस किए।
तुमसे शिकवा नहीं।
तुम्हें हक़ था जाने का।
शिकायत बस खुद से है....
क्यों सोचा था,
कि तुम… ठहरोगी?
रिश्ते की जो डोर थी…
कहते हैं वो टूट गई....
झूठ।
डोर नहीं टूटी…
मैं टूटा हूँ।
अब सपने नहीं आते,
इच्छाएँ नहीं जगतीं,
और दिल…
दिल अब सिर्फ़ धड़कता है,
जीता नहीं।
तो हाँ…
आज पहली बार मान रहा हूँ....
सब खत्म।
तुम।
हम।
और वो मैं....
जो प्यार करता था।
अब बस एक ठंडी सच्चाई बची है.....
मैं हार चुका हूँ।
और तुम्हारा जाना ही
मेरी कहानी का आख़िरी वाक्य था।
हां, मैं हार गया हूं।
हां, मैं हार गया हूं।
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