Sunday, 8 March 2026

डिजिटल सन्नाटा: भीड़ में खोती मानवीय संवेदनाएँ

डिजिटल सन्नाटा: भीड़ में खोती मानवीय संवेदनाएँ

वह शाम शायद साल की सबसे उदास शाम थी, जब मैंने एक भरे-पूरे कैफे के बीच खुद को एक अजीब से सन्नाटे में घिरा पाया। चारों तरफ कुर्सियां भरी थीं, कॉफ़ी की महक हवा में तैर रही थी और हल्की संगीत की धुन भी बज रही थी, लेकिन वहां 'संवाद' गायब था। हर मेज पर बैठे लोग एक-दूसरे के सामने तो थे, लेकिन उनकी नजरें अपनी हथेलियों में सिमटे उस चमकदार स्क्रीन पर जमी थीं जिसे हम स्मार्टफोन कहते हैं। वह दृश्य आज के आधुनिक समाज की उस कड़वी हकीकत का जीता-जागता विज्ञापन था, जिसे मैं 'डिजिटल सन्नाटा' कहता हूँ। हम इतिहास के उस दौर में जी रहे हैं जहाँ हम तकनीकी रूप से सबसे अधिक 'जुड़े' हुए हैं, लेकिन मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर शायद सबसे ज्यादा अकेले और कटे हुए भी।

यह अकेलापन उस अकेलेपन से बिल्कुल अलग है जो पुराने समय में एकांत कहलाता था। एकांत में मनुष्य खुद से मिलता था, लेकिन इस डिजिटल अकेलेपन में हम खुद से भी भाग रहे हैं। आज की दुनिया में 'फुर्सत' एक खोया हुआ शब्द बन गया है। पहले जब दो लोग साथ बैठते थे, तो उनके बीच मौन भी एक भाषा होती थी। आज उस मौन को भरने के लिए हम तुरंत अपनी जेब से फोन निकाल लेते हैं। हमें डर लगता है कि कहीं सामने वाले की आंखों में झांकना न पड़ जाए, कहीं कोई गहरी बात न निकल आए, या कहीं हमें अपनी ही बेचैनी का सामना न करना पड़ जाए। हम 'नोटिफिकेशन' के उस छोटे से लाल घेरे में अपनी खुशियां और अपनी बेचैनी तलाशने लगे हैं।

विडंबना देखिए कि हमारी फ्रेंड-लिस्ट हजारों में है, लेकिन जब मन के किसी कोने में कोई गहरी बात चुभती है, तो स्क्रॉल करते हुए अंगूठे रुकते नहीं हैं क्योंकि हमें पता है कि वहां 'सुनने' वाला कोई नहीं, सिर्फ 'देखने' वाले हैं। हमने अपनी भावनाओं को 'इमोजी' के छोटे-छोटे पैकेटों में बंद कर दिया है। दुख जताने के लिए एक उदास चेहरा भेज देना काफी है और खुशी के लिए चंद पीले हंसते हुए चेहरे। लेकिन क्या वह पीला चेहरा वाकई उस खिलखिलाहट की जगह ले सकता है जो अपनों के साथ बैठकर आती थी? क्या एक 'लाइक' उस थपकी का विकल्प हो सकता है जो कोई दोस्त कंधे पर देता था? शायद नहीं। हम संवेदनाओं के 'इंस्टेंट नूडल्स' के दौर में हैं, जहाँ सब कुछ तुरंत चाहिए, लेकिन उसमें वह पोषण और गहराई गायब है जो धीमे और ठहरे हुए रिश्तों में होती थी।

आज का युवा, और सच कहूं तो हर पीढ़ी, एक अदृश्य 'परफॉर्मेंस' के दबाव में जी रही है। हमें अपनी जिंदगी जीनी कम, दिखानी ज्यादा पड़ रही है। हम किसी खूबसूरत सूर्यास्त को अपनी आंखों से कम और कैमरे के लेंस से ज्यादा देखते हैं। हमारी प्राथमिकता यह नहीं होती कि उस पल की शांति को अपने भीतर उतारें, बल्कि यह होती है कि उसे एक 'स्टोरी' बनाकर दुनिया को बताएं कि हम कितने खुश हैं। यह एक किस्म का मानसिक प्रदर्शनवाद है, जहाँ हम दूसरों की तालियों के मोहताज हो गए हैं। और जब वे तालियां या 'लाइक' कम मिलते हैं, तो हम एक गहरे अवसाद और तुलना के भंवर में फंस जाते हैं। हम दूसरों की सजी-धजी डिजिटल जिंदगी से अपनी उलझी हुई वास्तविक जिंदगी की तुलना करने लगते हैं, यह भूलकर कि स्क्रीन के उस पार वाला इंसान भी उसी खालीपन से जूझ रहा है।

इस डिजिटल सन्नाटे ने हमारे परिवारों के भीतर भी एक दीवार खड़ी कर दी है। एक ही घर के अलग-अलग कमरों में बैठे सदस्य एक-दूसरे को व्हाट्सएप पर संदेश भेजते हैं। डाइनिंग टेबल पर हाथ में चम्मच कम और फोन ज्यादा होता है। यह सिर्फ समय की बर्बाद नहीं है, यह उस आत्मीयता की हत्या है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी कहानियों और किस्सों से ट्रांसफर होती थी। अब दादा-दादी के पास सुनाने को कहानियां तो हैं, लेकिन पोते-पोतियों के पास सुनने का धैर्य नहीं है, क्योंकि उनके 'शॉर्ट्स' और 'रील्स' उन्हें 15 सेकंड में नया रोमांच दे रहे हैं। हम धैर्य खोते जा रहे हैं। हमें अब गहराई से पढ़ना, गहराई से सोचना और गहराई से महसूस करना बोझ लगने लगा है।

हकीकत तो यह है कि इंटरनेट ने दूर बैठे लोगों को करीब लाने का वादा किया था, लेकिन इसने करीब बैठे लोगों को कोसों दूर कर दिया है। हम एक 'ग्लोबल विलेज' में तो रह रहे हैं, लेकिन उस गांव में हर घर के दरवाजे भीतर से बंद हैं। हम अपनी पहचान को उन 'हैशटैग्स' में ढूंढ रहे हैं जो हर हफ्ते बदल जाते हैं। आज हम जिस दौर में हैं, वहां 'प्राइवेसी' का मतलब बदल गया है। हम अपनी निजी बातें अजनबियों के साथ साझा कर रहे हैं और अपनों के सामने अजनबी बने हुए हैं। यह सन्नाटा गहरा है क्योंकि यह शोर के बीच पैदा हुआ है। यह वह सन्नाटा है जो तब महसूस होता है जब फोन की बैटरी खत्म हो जाती है और हमें अचानक पता चलता है कि हमारे पास बात करने के लिए कोई असल इंसान नहीं है।

हमें यह समझना होगा कि तकनीक एक साधन थी, साध्य नहीं। वह हमारी सुविधा के लिए थी, हमारी संवेदनाओं को निगलने के लिए नहीं। अगर हम अब भी नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियां शायद यह भूल ही जाएंगी कि किसी का हाथ थामकर बिना कुछ बोले मीलों चलना क्या होता है। वे शायद यह नहीं जान पाएंगे कि बारिश की बूंदों को महसूस करना और उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर डालने में कितना बड़ा अंतर है। हमें 'लॉग आउट' करना सीखना होगा ताकि हम अपनी असल जिंदगी में 'लॉग इन' कर सकें। हमें उन पलों को बचाना होगा जहाँ स्क्रीन की रोशनी नहीं, बल्कि अपनों की आंखों की चमक हमारे चेहरे को रोशन करे।

अंततः, यह लेख किसी तकनीक का विरोध नहीं है, बल्कि उस खोती हुई इंसानियत की पुकार है जो इस डिजिटल भीड़ में कहीं दब गई है। हमें फिर से उस कला को सीखना होगा जहाँ हम फोन को किनारे रखकर एक-दूसरे की खामोशी को पढ़ सकें। सन्नाटा बुरा नहीं होता, अगर वह एकांत का हो, लेकिन वह सन्नाटा खतरनाक है जो भीड़ के बीच आपको अकेला महसूस कराए। वक्त आ गया है कि हम अपनी जेबों में रखे इस छोटे से यंत्र को अपनी दुनिया न समझें, बल्कि खिड़की के बाहर की उस दुनिया को देखें जो असली है, जिसमें धूल है, पसीना है, संघर्ष है और सबसे बढ़कर—जिंदा एहसास हैं। तभी हम इस 'डिजिटल सन्नाटे' को तोड़कर फिर से मनुष्य बन पाएंगे।

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गोलू कुमार गुप्ता 
पटना , बिहार

Monday, 23 February 2026

वो जो घाट बन गए

महेंद्रू घाट की सीढ़ियों पर काई की तरह एक अजीब सी खामोशी चिपकी हुई थी। दिसंबर की उस सर्द रात में गंगा का पानी इतना शांत था कि लगता था जैसे उसे भी ठंड लग गई हो। दूर महात्मा गांधी सेतु पर रेंगते ट्रकों की पीली हेडलाइट्स कोहरे को चीरने की नाकाम कोशिश कर रही थीं।

लड़के ने अपने मफलर को थोड़ा और लपेटा और चाय के कुल्हड़ को दोनों हथेलियों के बीच दबा लिया। शायद चाय से ज्यादा गर्माहट उसे कुल्हड़ की सोंधी मिट्टी से मिल रही थी। लड़की सबसे निचली सीढ़ी पर बैठी, पानी की हल्की लहरों को घूर रही थी। काफी देर की रहस्यमयी चुप्पी के बाद उसने एक छोटा सा पत्थर पानी में उछाला। 'छपाक' की आवाज़ से सन्नाटा थोड़ा दरका।

"इतनी गहरी शांति में भी तुम शोर ढूँढ ही लेती हो," लड़के ने कुल्हड़ से एक घूंट लेते हुए बिना उसकी तरफ देखे कहा।

लड़की ने उसकी ओर एक तीखी और शिकायती नज़र डाली। "और तुम? तुम हर बात को इतने भारीपन से क्यों लेते हो? ये जो तुम्हारे भीतर एक बेवजह का 'ठहराव' है न... मुझे कभी-कभी इससे बहुत घुटन होने लगती है।"

लड़के ने मुस्कुराकर खाली कुल्हड़ बगल में रख दिया। "घुटन ठहराव से नहीं होती। घुटन भागते रहने की उस आदत से होती है, जो हमें कभी रुकने नहीं देती। हम सब एक ऐसी ट्रेन में बैठे हैं, जिसे बस किसी तरह अगले स्टेशन पर पहुँचने की जल्दी है। खिड़की से बाहर का सुकून भरा परिदृश्य कोई देखना ही नहीं चाहता।"

"तो क्या हमेशा इसी घाट पर बैठे रहें? ज़िंदगी में कुछ 'हासिल' नहीं करना?" लड़की की आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी थी।

"हासिल?" लड़का थोड़ा हँसा, एक थकी हुई सी हँसी। "प्रेम में या ज़िंदगी में... जो पूरी तरह 'हासिल' हो गया, वो उसी पल बस एक 'समझौता' बनकर रह जाता है। और जहाँ समझौता आ गया, वहाँ प्रेम अपनी आज़ादी खो देता है।"

लड़की कुछ देर चुप रही। उसकी आँखों में सेतु की वो दूर वाली पीली रोशनी तैर रही थी।

"तुम्हारी यही बातें मुझे डराती हैं," उसने एक गहरी साँस छोड़ते हुए कहा। "मैं एक आम सी लड़की हूँ। मुझे बस छोटी-छोटी खुशियाँ चाहिए, एक सधा हुआ कल चाहिए... और तुम मुझे हमेशा अनंत और शून्यता की बातें बताते हो। मुझे लगता है जैसे मैं महज़ इक्कीस पन्नों की कोई बहुत साधारण सी किताब हूँ, और तुम कोई ऐसा महाकाव्य जिसे समझना मेरे बस का नहीं।"

लड़के ने धीरे से खिसक कर उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। उसकी उंगलियाँ बर्फ की तरह ठंडी थीं।

"कोई भी किताब पन्नों की गिनती से बड़ी नहीं होती," लड़के ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "वो उस शिद्दत से बड़ी होती है, जिससे उसे पढ़ा जाता है। अगर कोई उन इक्कीस पन्नों को ही उम्र भर पढ़ता रहे, हर बार एक नया अर्थ निकाले... तो क्या वो किसी महाकाव्य से कम है?"

लड़की के भीतर का सारा शोर जैसे अचानक शांत हो गया। पटना की वो कंपा देने वाली सर्दी अब उसे उतनी बुरी नहीं लग रही थी। कंकड़बाग की उन भीड़-भाड़ वाली सड़कों और दिन भर की भागदौड़ से दूर, उसे लगा कि शायद इस लड़के के भीतर जो खामोशी है, वही उसका असल घर है।

"तो... पढ़ोगे मुझे? हर बार एक नए अर्थ के साथ?" उसने अपनी ठंडी उंगलियों को लड़के के हाथ में और कसते हुए पूछा।

"जब तक ये आँखें साथ देंगी... और जब तक ये गंगा इसी इत्मीनान से बहती रहेगी," लड़के ने नदी की तरफ देखते हुए कहा।

उस रात कोहरे ने उन दोनों को अपनी चादर में ऐसे ढक लिया, जैसे कोई बहुत पुरानी, आधी-अधूरी रह गई कविता को आख़िरकार उसका मुकम्मल आख़िरी पन्ना मिल गया हो।
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Saturday, 17 January 2026

माफ़ी का रंग

आसमान में सूरज ने अब सिंदूरी रंग बिखेरना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था जैसे दिन भर की थकान के बाद आसमान भी थोड़ा भावुक हो गया हो। हम दोनों पार्क की उस ढलान पर बैठे थे, जहाँ से पूरा शहर किसी खिलौने जैसा छोटा नज़र आता था।

काफी देर तक हमारे बीच कोई शब्द नहीं था। बस ठंडी हवाओं का शोर था और दूर कहीं बजती हुई मंदिर की घंटियाँ।

उसने खामोशी तोड़ते हुए आसमान की ओर इशारा किया और पूछा—
"ये शाम हमेशा इतनी उदास क्यों होती है?"

मैंने उसकी ओर देखा और मुस्कुरा कर कहा, "ये उदासी नहीं है। ये तो 'तसल्ली' का रंग है। देखो न, सूरज ने पूरे दिन तपिश झेली, दुनिया को रौशनी दी और अब वो शांति से विदा ले रहा है। बिना किसी शिकायत के।"

उसने अपनी नज़रें नीची कीं और घास के एक तिनके को उखाड़ते हुए कहा, "पर क्या विदा लेना इतना आसान होता है? जैसे हम इंसानों के बीच... जब कुछ टूटता है, तो पीछे एक कड़वाहट रह जाती है। क्या सूरज को दुख नहीं होता कि उसे कल फिर उसी तपिश में जलना होगा?"

मैंने जवाब दिया, "सूरज को दुख इसलिए नहीं होता क्योंकि वो हर शाम दुनिया को 'माफ़' करके ढलता है। अगर वो अपनी गर्मी का हिसाब रखने लगे, तो कभी दोबारा उग नहीं पाएगा। माफ़ी भी बिल्कुल इस शाम की लालिमा जैसी होती है—गहरी, सुकून देने वाली और सुंदर।"

उसने मेरी आँखों में झाँका, उसकी आँखों में थोड़ी नमी थी। उसने धीमे से पूछा, "तो क्या माफ़ कर देने से सब कुछ पहले जैसा हो जाता है?"

"सब कुछ पहले जैसा शायद न हो," मैंने उसका हाथ धीरे से थामते हुए कहा, "लेकिन माफ़ करने से तुम्हारे अंदर का वो 'भारीपन' ज़रूर खत्म हो जाता है। देखो, सूरज ढल रहा है तभी तो तारों को चमकने की जगह मिलेगी। जब तक तुम कल की शिकायतों को मुट्ठी में भींचे रखोगी, तब तक आने वाले सुकून के लिए हाथ खाली कैसे होगा?"

उसने एक गहरी साँस ली। चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान उभरी, जैसे बरसों का कोई बोझ उतर गया हो।

"आज पहली बार ये लाल रंग मुझे खून जैसा नहीं, बल्कि किसी पुराने घाव के भर जाने जैसा लग रहा है," उसने धीरे से कहा।

सूरज अब पूरी तरह छिप चुका था, पर आसमान में उसकी लाली अभी भी बाकी थी—बिल्कुल वैसे ही, जैसे माफ़ कर देने के बाद दिल में एक मीठा सा अहसास बाकी रह जाता है।
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गोलू
पटना से

Thursday, 8 January 2026

दूरी का भ्रम ( थोड़ा सा इश्क़ )

तुम्हारे न होने से,
सच कहूँ तो...
दुनिया के कामकाज में कोई फर्क नहीं पड़ा।
सूरज अब भी उसी वक्त निकलता है,
हवा अब भी उसी तरह बहती है,
और शहर का शोर भी
बिलकुल वैसा ही है।

सब कुछ... बेहद सामान्य है।

मगर मेरे भीतर,
एक 'अदृश्य' सा बदलाव आ गया है।
पहले, जब मैं कमरे में अकेला होता था,
तो उसे 'एकांत' कहता था,
मगर अब...
वही अकेलापन 'वीरानी' सा लगता है।

तुम्हें पता है?
अब मैं चीजों को सिर्फ देखता नहीं,
उन्हें तुम्हारी नज़र से तौलता हूँ।
कोई अच्छा दृश्य दिखे,
तो पहला ख्याल यही आता है कि
"काश! तुम भी इसे देख पातीं।"

यह अजीब विरोधाभास है 
कि भौतिक रूप से
तुम यहाँ से कोसों दूर हो,
मगर मानसिक रूप से 
तुमने मेरे भीतर इतनी जगह घेर ली है
कि मुझे अपने ही ख्यालों में
पांव रखने के लिए
तुम्हारी यादों से इजाज़त लेनी पड़ती है।

लोग कहते हैं कि दूरियों से
रिश्ते फीके पड़ जाते हैं,
मगर मेरा अनुभव अलग है।
तुम्हारी यह 'गैर-मौजूदगी'
मुझे हर पल
तुम्हारी 'मौजूदगी' का
और गहरा अहसास कराती है।

शायद...
प्रेम पास रहने का नाम नहीं,
बल्कि दूर रहकर भी
किसी को अपने भीतर
लगातार महसूस करने का नाम है।
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Tuesday, 6 January 2026

दखल (थोड़ा सा इश्क़)


तुम्हारे आने से पहले,

यकीन मानो...

मेरी दिनचर्या में कोई 'खामी' नहीं थी,

सब कुछ वैसा ही था

जैसा एक मसरूफ शहर का होता है।


वक्त पर जागना,

वक्त पर सोना,

और बीच के सारे पहर

बड़ी मुस्तैदी से खर्च करना

दुनियादारी के हिसाब-किताब में।


मगर...

जब से तुमने मेरे ख्यालों में

जगह बनाई है,

एक अजीब सा 'दखल' महसूस होता है

मेरे सधे हुए वक्त में।


अब अक्सर ऐसा होता है,

कि चाय की प्याली

हाथ में धरी रह जाती है

और भाप ठंडी हो जाती है,

क्योंकि ठीक उसी वक्त

आंखों के सामने से गुज़रती है

तुम्हारी वह हल्की सी मुस्कुराहट।


किताब के पन्ने पलटते हुए

अचानक उंगलियाँ रुक जाती हैं

किसी ऐसे शब्द पर,

जो तुम्हारे नाम जैसा लगता है,

और फिर...

घंटों तक वह पन्ना पलटा नहीं जाता।


यह प्रेम नहीं है शायद,

यह तो मेरे 'वर्तमान' में

तुम्हारी यादों की 'साज़िश' है।


जो मुझे यह अहसास दिलाती है

कि मैं जिसे 'जीना' समझ रहा था,

वह महज सांसें लेना था,

ज़िंदगी तो अब शुरू हुई है—

इस मीठी सी अव्यवस्था के साथ।


हाँ, पहले मैं सिर्फ 'व्यस्त' था,

अब मैं... 'लापता' हूँ!



Wednesday, 26 November 2025

तुमसे हसीं कोई नज़ारा नहीं मिला

तुमसे हसीं कोई नज़ारा नहीं मिला
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तुमसे अच्छा कोई सहारा नहीं मिला ,
इस दरिया को कोई किनारा नहीं मिला ।

यूं तो आएं ज़िंदगी में समझदार लोग भी ,
मगर तुम जैसा कोई सितारा नहीं मिला ।

यूं तो हजार देखे मंजर इन आंखों ने ,
तुमसे हसीं कोई नजारा नहीं मिला ..!!

हर राह पर चलती रही ये ज़िंदगानी,
पर मंजिल कोई भी दोबारा नहीं मिला ।

लाख कोशिशें की इन लबों ने मुस्कुराने की,
मगर तेरे बिन कोई इशारा नहीं मिला ।

ढूंढा मैंने इस जहाँ के हर कोने में,
पर कोई वजूद इतना प्यारा नहीं मिला ।

यूँ तो महफ़िलें सजीं हर रोज़ रोशनियों से,
मगर तेरी आँख जैसा उजियारा नहीं मिला ।

भीड़ में खोया रहा दिल, पुकारता रहा नाम तेरा,
इस भीड़ में कोई गवारा नहीं मिला ।

यूँ तो दौलत और शोहरत की कमी न हुई,
पर तेरे प्यार सा कोई खजाना नहीं मिला ।

कई साज़ बजे, कई राग अलापे गए,
मगर तेरी धड़कन सा कोई नगाड़ा नहीं मिला ।

देखा है मैंने हर रिश्ते को टूटते-बनते,
पर तेरे साथ जैसा कोई किनारा नहीं मिला ।

बहुत बातें की लोगों ने, ज्ञान की, प्रेम की,
पर तेरी खामोशी सा कोई सहारा नहीं मिला ।

हाँ, तेरी परछाई से ही है इस दिल की रौनक,
तुझसे दूर जाकर कोई गुजारा नहीं मिला ।

बस एक तू ही है जो मेरे हर दर्द की दवा है,
तेरे अलावा कोई हमारा नहीं मिला ।

यह जीवन भी अब तेरे नाम कर दिया है,
अब जीने का और कोई सहारा नहीं मिला ।

Monday, 24 November 2025

पहुंच से बाहर

मैंने दुनिया नाप ली,
पहाड़ों के
शिखरों तक पहुँच गया,
उन ऊँचे, बर्फीले
ताज को छू लिया,
जहाँ बादलों का डेरा था।

समुद्र के तल को
देख आया,
गहरे, अथाह नीलेपन में
डूब कर,
मोतियों की खान को
ढूंढ लिया,
अंधेरे की चुप्पी को
सुन आया,
जलजले की लहरों को
गले लगाया।

नदियों के आखिरी छोर
तक पहुँच गया,
उनके उद्गम के रहस्य को
पहचान लिया,
उनके बहाव की गति को
महसूस किया,
हर मोड़ पर प्रकृति के
इशारे को समझा।

मैंने इतिहास के पन्ने
पलट कर देखे,
हर सभ्यता की नींव
को टटोल लिया,
समय की धूल में दबे
राज्यों को जान लिया,
अतीत के हर किस्से को
जीकर आया।

ब्रह्माण्ड के तारों को
गिना है मैंने,
हर ग्रह की कक्षा में
झाँक लिया,
विज्ञान की प्रयोगशाला में
हर सूत्र को हल किया,
जीवन के जटिल सवालों
का जवाब दिया।

मैंने हर यात्रा
पूरी कर ली,
हर मुकाम
हासिल कर लिया,
हर बाधा
पार कर ली,
किन्तु,

“किन्तु मैं नहीं पहुँच
पाया तुम्हारे
'हृदय' तक...!!"

Sunday, 23 November 2025

बस कुछ और पल


बस कुछ और पल...

फिर यह पल भी ढल जाना है।

जो ठहरा लगता है आज,

उसका भी आगे निकल जाना है।


​जो बीते दिन हैं,

बस यादों में ही सुलझ रहे,

उनको धुंधला ही हो जाना है।

बस कुछ और पल...


​जो जीवन की डगर है,

रुकती नहीं, बहती जाती है,

उसको गंतव्य पर पहुंच जाना है।

बस कुछ और पल...


​जो हर श्वास है आती-जाती,

जैसे हवा का झोंका हो कोई,

उसको थम कर ठहर जाना है।

बस कुछ और पल...


​जो उम्मीदें हैं पनपती,

हर रोज नए ख्वाबों की तरह,

उनको स्वप्न ही बन रह जाना है।

बस कुछ और पल...


​जो कल की आहट है,

आज को लीलने को आतुर,

जरा-जरा उसको अतीत हो जाना है।

बस कुछ और पल...


जो रिश्तों की तपिश है,

दिल में धड़कती मौन सी आग,

उसे भी राख बन मिट जाना है।

बस कुछ और पल…


जो मुस्कानों का कारवां है,

आँसुओं की गलियों से गुज़रता,

उसे भी ख़ामोश रात बन जाना है।

बस कुछ और पल…


फिर सब धुंधला, सब फीका,

सिर्फ़ हवाओं में नाम रह जाएंगे,

जो आज है, वो कल कहानी बन जाना है।

बस कुछ और पल…

.....

लेखक: गोलू कुमार गुप्ता

.....

Saturday, 22 November 2025

किसी और की..!


तू ख्वाब थी जो आँखों में,

अब सच्चाई है किसी और की।


जिस दिल की तू धड़कन थी,

अब धड़कन है किसी और की।


मेरी तन्हा सी रातों में,

अब रौशनी है किसी और की।


जिस राह पे तुझे माँगा था,

अब मंज़िल है किसी और की।


तेरे बिना जो अधूरा था,

अब कहानी है किसी और की।


जिस पल में तेरी यादें थीं,

अब वह घड़ी है किसी और की।


मैं जिस गीत में डूबा था,

अब वो धुन है किसी और की।


जो मुस्कान थी होंठों पे,

अब वो हँसी है किसी और की।


तेरे बिना जो वीरान था,

अब वो बस्ती है किसी और की।


जिस छाँव में सुकून मिला,

अब वो छाया है किसी और की।


तेरे नाम पे जो जिया करता,

अब ज़िंदगी है किसी और की।


तेरा हर एक इशारा था,

अब बंदगी है किसी और की।


जिस स्पर्श से दिल महका था,

अब वो खुशबू है किसी और की।


जो लहरें थीं मेरी साँसों की,

अब वो नदी है किसी और की।


तेरे लिए जो अश्क बहे,

अब वो नमी है किसी और की।


मैं रोया तेरे ख्वाबों में,

अब वो नींद है किसी और की।


जिस आँगन में तेरा नाम लिखा,

अब वो चौखट है किसी और की।


जिस रंग से तू रंगी थी,

अब वो होली है किसी और की।


तेरे लिए जो दिल धड़का,

अब वो धड़कन है किसी और की।


तू प्यार थी जो मेरा कभी,

अब चाहत है किसी और की।

- गोलू कुमार गुप्ता

Friday, 21 November 2025

मैं हार गया..!


कहता हूँ…

सब ठीक है।

पर सच ये है…

कुछ भी ठीक नहीं है।


जिस दिन तुम गई…

उस दिन सिर्फ़ तुम नहीं गईं,

कुछ मेरा भी चला गया।

और जो बचा है…

वो मैं नहीं हूँ।


मैं हार गया हूँ।

हाँ…

सीधे, साफ़, बिना बहस....

मैं हार गया हूँ।


कभी सोचा था…

मोहब्बत संभाल लूँगा,

रिश्ता बचा लूँगा,

पर देखो....

तुम चली गईं

और मैं… वहीं का वहीं रह गया।


हा, हा, हा, हा 😅😅

मजेदार है ना?

तुम चल दीं,

और मेरी दुनिया रुक गई।


वो मोड़…

जहाँ तुमने हाथ छोड़ा था,

तब समझ नहीं आया....

तुम्हारा हाथ छूटा था,

या मेरा वजूद।


उस रात चिराग बुझा नहीं था,

बस....

आख़िरी बार लौ काँपी थी।

और फिर ख़ामोशी उतर आई....

सीधी दिल में।

ठंडी।

पत्थर जैसी।


अब शहर शोर करता है,

पर भीतर सब सन्नाटा है।

लोग चलते हैं, हँसते हैं,

और मैं…

बस देखता हूँ।

बिना महसूस किए।


तुमसे शिकवा नहीं।

तुम्हें हक़ था जाने का।

शिकायत बस खुद से है....

क्यों सोचा था,

कि तुम… ठहरोगी?


रिश्ते की जो डोर थी…

कहते हैं वो टूट गई....

झूठ।

डोर नहीं टूटी…

मैं टूटा हूँ।


अब सपने नहीं आते,

इच्छाएँ नहीं जगतीं,

और दिल…

दिल अब सिर्फ़ धड़कता है,

जीता नहीं।


तो हाँ…

आज पहली बार मान रहा हूँ....

सब खत्म।


तुम।

हम।

और वो मैं....

जो प्यार करता था।


अब बस एक ठंडी सच्चाई बची है.....

मैं हार चुका हूँ।

और तुम्हारा जाना ही

मेरी कहानी का आख़िरी वाक्य था।


हां, मैं हार गया हूं।

हां, मैं हार गया हूं।

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