Saturday, 14 March 2026

ये महक , ये लम्हा !

 

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आज कमरे में अकेला होकर भी मैं अकेला नहीं था। बदन पर तुम्हारी दी हुई वह काली कमीज थी, जिसकी हर एक सिलवट में तुम्हारे स्पर्श की गर्माहट महसूस हो रही थी। सामने लैपटॉप की स्क्रीन पर तुम्हारी वह कातिल मुस्कान बिखरी थी, जिसने पूरे कमरे को एक रूहानी रोशनी से भर दिया था।


तभी खिड़की से बसंती हवा का एक शोख झोंका आया, जो मानो तुम्हारे आंचल की खुशबू लेकर आया हो। उस ठंडी छुअन ने जैसे मेरे कानों में तुम्हारी पायल की खनक घोल दी। दूरी तो बस जिस्मों की है, रूह तो इस वक्त भी एक-दूसरे में सिमटी हुई है। इसी भावुक और श्रृंगारिक मिलन को मैंने इन पंक्तियों में पिरोने की कोशिश की है:



ये महक , ये लम्हा 

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कमीज की हर एक सिलवट में,

जैसे तुम्हारे हाथों की छुअन बाकी है।

तस्वीर बोलती तो नहीं,

पर तुम्हारी वो मुस्कान,

हर अनकही बात का साखी है।


लैपटॉप की स्क्रीन से उठकर,

तुम्हारी ये हंसी जैसे कमरे में टहलने लगी है।

बसंती हवा का ये झोंका,

अब मेरी आँखों को मलने लगी है।


मुझे लगता है—

तुमने ही भेजा है ये पैगाम इस हवा के साथ,

कि दूर रहकर भी,

तुम चल रही हो मेरे साथ, थामे मेरा हाथ।


ये महक, ये लम्हा, ये तुम्हारी दी हुई कमीज,

जैसे दुनिया की सबसे नायाब चीज़।

मैं बस यहीं, इसी पल में ठहर जाना चाहता हूँ,

तुम्हारी इस तस्वीर में, खुद को खो देना चाहता हूँ।

Thursday, 12 March 2026

मेरे हिस्से का सन्नाटा , तुम्हारे हिस्से की पायल

तुम्हारे पैरों की वो चांदी की पायल,
महज़ एक ज़ेवर नहीं है,
वह एक इबादत है—
उस अनसुनी आवाज़ की, जिसे सुनने का हक़ सिर्फ मेरा था।

अजीब सन्नाटा पसरा होगा उस घर में,
जहाँ तुम चलती होगी और पायल छनकती होगी,
मगर उन दीवारों को, उन रास्तों को रत्ती भर फर्क नहीं पड़ता,
कि उन घुंघरुओं में कितनी अधूरी बातें दबी हैं।

वो पायल—
कभी तुम्हारे जज़्बातों की तरह आपस में टकराती है,
कभी तुम्हारे उदास क़दमों के साथ भारी हो जाती है,
बिल्कुल उस इंतज़ार की तरह, जो हम दोनों के बीच फैला है।

मैंने आज तक उसे सुना नहीं,
मगर जब भी हवा चलती है,
मुझे महसूस होता है जैसे तुमने कहीं कोई क़दम रखा है,
और उसकी गूँज मेरे सीने के खालीपन में उतर गई है।

मैं अक्सर सोचता हूँ,
कितनी बदनसीब है वो खनक—
जो गूँजती वहाँ है जहाँ उसे कोई समझता नहीं,
और जिसे उसकी तड़प पता है, वो हज़ारों मील दूर बैठा है।
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Sunday, 8 March 2026

डिजिटल सन्नाटा: भीड़ में खोती मानवीय संवेदनाएँ

डिजिटल सन्नाटा: भीड़ में खोती मानवीय संवेदनाएँ

वह शाम शायद साल की सबसे उदास शाम थी, जब मैंने एक भरे-पूरे कैफे के बीच खुद को एक अजीब से सन्नाटे में घिरा पाया। चारों तरफ कुर्सियां भरी थीं, कॉफ़ी की महक हवा में तैर रही थी और हल्की संगीत की धुन भी बज रही थी, लेकिन वहां 'संवाद' गायब था। हर मेज पर बैठे लोग एक-दूसरे के सामने तो थे, लेकिन उनकी नजरें अपनी हथेलियों में सिमटे उस चमकदार स्क्रीन पर जमी थीं जिसे हम स्मार्टफोन कहते हैं। वह दृश्य आज के आधुनिक समाज की उस कड़वी हकीकत का जीता-जागता विज्ञापन था, जिसे मैं 'डिजिटल सन्नाटा' कहता हूँ। हम इतिहास के उस दौर में जी रहे हैं जहाँ हम तकनीकी रूप से सबसे अधिक 'जुड़े' हुए हैं, लेकिन मानवीय संवेदनाओं के धरातल पर शायद सबसे ज्यादा अकेले और कटे हुए भी।

यह अकेलापन उस अकेलेपन से बिल्कुल अलग है जो पुराने समय में एकांत कहलाता था। एकांत में मनुष्य खुद से मिलता था, लेकिन इस डिजिटल अकेलेपन में हम खुद से भी भाग रहे हैं। आज की दुनिया में 'फुर्सत' एक खोया हुआ शब्द बन गया है। पहले जब दो लोग साथ बैठते थे, तो उनके बीच मौन भी एक भाषा होती थी। आज उस मौन को भरने के लिए हम तुरंत अपनी जेब से फोन निकाल लेते हैं। हमें डर लगता है कि कहीं सामने वाले की आंखों में झांकना न पड़ जाए, कहीं कोई गहरी बात न निकल आए, या कहीं हमें अपनी ही बेचैनी का सामना न करना पड़ जाए। हम 'नोटिफिकेशन' के उस छोटे से लाल घेरे में अपनी खुशियां और अपनी बेचैनी तलाशने लगे हैं।

विडंबना देखिए कि हमारी फ्रेंड-लिस्ट हजारों में है, लेकिन जब मन के किसी कोने में कोई गहरी बात चुभती है, तो स्क्रॉल करते हुए अंगूठे रुकते नहीं हैं क्योंकि हमें पता है कि वहां 'सुनने' वाला कोई नहीं, सिर्फ 'देखने' वाले हैं। हमने अपनी भावनाओं को 'इमोजी' के छोटे-छोटे पैकेटों में बंद कर दिया है। दुख जताने के लिए एक उदास चेहरा भेज देना काफी है और खुशी के लिए चंद पीले हंसते हुए चेहरे। लेकिन क्या वह पीला चेहरा वाकई उस खिलखिलाहट की जगह ले सकता है जो अपनों के साथ बैठकर आती थी? क्या एक 'लाइक' उस थपकी का विकल्प हो सकता है जो कोई दोस्त कंधे पर देता था? शायद नहीं। हम संवेदनाओं के 'इंस्टेंट नूडल्स' के दौर में हैं, जहाँ सब कुछ तुरंत चाहिए, लेकिन उसमें वह पोषण और गहराई गायब है जो धीमे और ठहरे हुए रिश्तों में होती थी।

आज का युवा, और सच कहूं तो हर पीढ़ी, एक अदृश्य 'परफॉर्मेंस' के दबाव में जी रही है। हमें अपनी जिंदगी जीनी कम, दिखानी ज्यादा पड़ रही है। हम किसी खूबसूरत सूर्यास्त को अपनी आंखों से कम और कैमरे के लेंस से ज्यादा देखते हैं। हमारी प्राथमिकता यह नहीं होती कि उस पल की शांति को अपने भीतर उतारें, बल्कि यह होती है कि उसे एक 'स्टोरी' बनाकर दुनिया को बताएं कि हम कितने खुश हैं। यह एक किस्म का मानसिक प्रदर्शनवाद है, जहाँ हम दूसरों की तालियों के मोहताज हो गए हैं। और जब वे तालियां या 'लाइक' कम मिलते हैं, तो हम एक गहरे अवसाद और तुलना के भंवर में फंस जाते हैं। हम दूसरों की सजी-धजी डिजिटल जिंदगी से अपनी उलझी हुई वास्तविक जिंदगी की तुलना करने लगते हैं, यह भूलकर कि स्क्रीन के उस पार वाला इंसान भी उसी खालीपन से जूझ रहा है।

इस डिजिटल सन्नाटे ने हमारे परिवारों के भीतर भी एक दीवार खड़ी कर दी है। एक ही घर के अलग-अलग कमरों में बैठे सदस्य एक-दूसरे को व्हाट्सएप पर संदेश भेजते हैं। डाइनिंग टेबल पर हाथ में चम्मच कम और फोन ज्यादा होता है। यह सिर्फ समय की बर्बाद नहीं है, यह उस आत्मीयता की हत्या है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी कहानियों और किस्सों से ट्रांसफर होती थी। अब दादा-दादी के पास सुनाने को कहानियां तो हैं, लेकिन पोते-पोतियों के पास सुनने का धैर्य नहीं है, क्योंकि उनके 'शॉर्ट्स' और 'रील्स' उन्हें 15 सेकंड में नया रोमांच दे रहे हैं। हम धैर्य खोते जा रहे हैं। हमें अब गहराई से पढ़ना, गहराई से सोचना और गहराई से महसूस करना बोझ लगने लगा है।

हकीकत तो यह है कि इंटरनेट ने दूर बैठे लोगों को करीब लाने का वादा किया था, लेकिन इसने करीब बैठे लोगों को कोसों दूर कर दिया है। हम एक 'ग्लोबल विलेज' में तो रह रहे हैं, लेकिन उस गांव में हर घर के दरवाजे भीतर से बंद हैं। हम अपनी पहचान को उन 'हैशटैग्स' में ढूंढ रहे हैं जो हर हफ्ते बदल जाते हैं। आज हम जिस दौर में हैं, वहां 'प्राइवेसी' का मतलब बदल गया है। हम अपनी निजी बातें अजनबियों के साथ साझा कर रहे हैं और अपनों के सामने अजनबी बने हुए हैं। यह सन्नाटा गहरा है क्योंकि यह शोर के बीच पैदा हुआ है। यह वह सन्नाटा है जो तब महसूस होता है जब फोन की बैटरी खत्म हो जाती है और हमें अचानक पता चलता है कि हमारे पास बात करने के लिए कोई असल इंसान नहीं है।

हमें यह समझना होगा कि तकनीक एक साधन थी, साध्य नहीं। वह हमारी सुविधा के लिए थी, हमारी संवेदनाओं को निगलने के लिए नहीं। अगर हम अब भी नहीं संभले, तो आने वाली पीढ़ियां शायद यह भूल ही जाएंगी कि किसी का हाथ थामकर बिना कुछ बोले मीलों चलना क्या होता है। वे शायद यह नहीं जान पाएंगे कि बारिश की बूंदों को महसूस करना और उसकी तस्वीर सोशल मीडिया पर डालने में कितना बड़ा अंतर है। हमें 'लॉग आउट' करना सीखना होगा ताकि हम अपनी असल जिंदगी में 'लॉग इन' कर सकें। हमें उन पलों को बचाना होगा जहाँ स्क्रीन की रोशनी नहीं, बल्कि अपनों की आंखों की चमक हमारे चेहरे को रोशन करे।

अंततः, यह लेख किसी तकनीक का विरोध नहीं है, बल्कि उस खोती हुई इंसानियत की पुकार है जो इस डिजिटल भीड़ में कहीं दब गई है। हमें फिर से उस कला को सीखना होगा जहाँ हम फोन को किनारे रखकर एक-दूसरे की खामोशी को पढ़ सकें। सन्नाटा बुरा नहीं होता, अगर वह एकांत का हो, लेकिन वह सन्नाटा खतरनाक है जो भीड़ के बीच आपको अकेला महसूस कराए। वक्त आ गया है कि हम अपनी जेबों में रखे इस छोटे से यंत्र को अपनी दुनिया न समझें, बल्कि खिड़की के बाहर की उस दुनिया को देखें जो असली है, जिसमें धूल है, पसीना है, संघर्ष है और सबसे बढ़कर—जिंदा एहसास हैं। तभी हम इस 'डिजिटल सन्नाटे' को तोड़कर फिर से मनुष्य बन पाएंगे।

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गोलू कुमार गुप्ता 
पटना , बिहार

Monday, 23 February 2026

वो जो घाट बन गए

महेंद्रू घाट की सीढ़ियों पर काई की तरह एक अजीब सी खामोशी चिपकी हुई थी। दिसंबर की उस सर्द रात में गंगा का पानी इतना शांत था कि लगता था जैसे उसे भी ठंड लग गई हो। दूर महात्मा गांधी सेतु पर रेंगते ट्रकों की पीली हेडलाइट्स कोहरे को चीरने की नाकाम कोशिश कर रही थीं।

लड़के ने अपने मफलर को थोड़ा और लपेटा और चाय के कुल्हड़ को दोनों हथेलियों के बीच दबा लिया। शायद चाय से ज्यादा गर्माहट उसे कुल्हड़ की सोंधी मिट्टी से मिल रही थी। लड़की सबसे निचली सीढ़ी पर बैठी, पानी की हल्की लहरों को घूर रही थी। काफी देर की रहस्यमयी चुप्पी के बाद उसने एक छोटा सा पत्थर पानी में उछाला। 'छपाक' की आवाज़ से सन्नाटा थोड़ा दरका।

"इतनी गहरी शांति में भी तुम शोर ढूँढ ही लेती हो," लड़के ने कुल्हड़ से एक घूंट लेते हुए बिना उसकी तरफ देखे कहा।

लड़की ने उसकी ओर एक तीखी और शिकायती नज़र डाली। "और तुम? तुम हर बात को इतने भारीपन से क्यों लेते हो? ये जो तुम्हारे भीतर एक बेवजह का 'ठहराव' है न... मुझे कभी-कभी इससे बहुत घुटन होने लगती है।"

लड़के ने मुस्कुराकर खाली कुल्हड़ बगल में रख दिया। "घुटन ठहराव से नहीं होती। घुटन भागते रहने की उस आदत से होती है, जो हमें कभी रुकने नहीं देती। हम सब एक ऐसी ट्रेन में बैठे हैं, जिसे बस किसी तरह अगले स्टेशन पर पहुँचने की जल्दी है। खिड़की से बाहर का सुकून भरा परिदृश्य कोई देखना ही नहीं चाहता।"

"तो क्या हमेशा इसी घाट पर बैठे रहें? ज़िंदगी में कुछ 'हासिल' नहीं करना?" लड़की की आवाज़ में एक अजीब सी बेचैनी थी।

"हासिल?" लड़का थोड़ा हँसा, एक थकी हुई सी हँसी। "प्रेम में या ज़िंदगी में... जो पूरी तरह 'हासिल' हो गया, वो उसी पल बस एक 'समझौता' बनकर रह जाता है। और जहाँ समझौता आ गया, वहाँ प्रेम अपनी आज़ादी खो देता है।"

लड़की कुछ देर चुप रही। उसकी आँखों में सेतु की वो दूर वाली पीली रोशनी तैर रही थी।

"तुम्हारी यही बातें मुझे डराती हैं," उसने एक गहरी साँस छोड़ते हुए कहा। "मैं एक आम सी लड़की हूँ। मुझे बस छोटी-छोटी खुशियाँ चाहिए, एक सधा हुआ कल चाहिए... और तुम मुझे हमेशा अनंत और शून्यता की बातें बताते हो। मुझे लगता है जैसे मैं महज़ इक्कीस पन्नों की कोई बहुत साधारण सी किताब हूँ, और तुम कोई ऐसा महाकाव्य जिसे समझना मेरे बस का नहीं।"

लड़के ने धीरे से खिसक कर उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। उसकी उंगलियाँ बर्फ की तरह ठंडी थीं।

"कोई भी किताब पन्नों की गिनती से बड़ी नहीं होती," लड़के ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "वो उस शिद्दत से बड़ी होती है, जिससे उसे पढ़ा जाता है। अगर कोई उन इक्कीस पन्नों को ही उम्र भर पढ़ता रहे, हर बार एक नया अर्थ निकाले... तो क्या वो किसी महाकाव्य से कम है?"

लड़की के भीतर का सारा शोर जैसे अचानक शांत हो गया। पटना की वो कंपा देने वाली सर्दी अब उसे उतनी बुरी नहीं लग रही थी। कंकड़बाग की उन भीड़-भाड़ वाली सड़कों और दिन भर की भागदौड़ से दूर, उसे लगा कि शायद इस लड़के के भीतर जो खामोशी है, वही उसका असल घर है।

"तो... पढ़ोगे मुझे? हर बार एक नए अर्थ के साथ?" उसने अपनी ठंडी उंगलियों को लड़के के हाथ में और कसते हुए पूछा।

"जब तक ये आँखें साथ देंगी... और जब तक ये गंगा इसी इत्मीनान से बहती रहेगी," लड़के ने नदी की तरफ देखते हुए कहा।

उस रात कोहरे ने उन दोनों को अपनी चादर में ऐसे ढक लिया, जैसे कोई बहुत पुरानी, आधी-अधूरी रह गई कविता को आख़िरकार उसका मुकम्मल आख़िरी पन्ना मिल गया हो।
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Saturday, 17 January 2026

माफ़ी का रंग

आसमान में सूरज ने अब सिंदूरी रंग बिखेरना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था जैसे दिन भर की थकान के बाद आसमान भी थोड़ा भावुक हो गया हो। हम दोनों पार्क की उस ढलान पर बैठे थे, जहाँ से पूरा शहर किसी खिलौने जैसा छोटा नज़र आता था।

काफी देर तक हमारे बीच कोई शब्द नहीं था। बस ठंडी हवाओं का शोर था और दूर कहीं बजती हुई मंदिर की घंटियाँ।

उसने खामोशी तोड़ते हुए आसमान की ओर इशारा किया और पूछा—
"ये शाम हमेशा इतनी उदास क्यों होती है?"

मैंने उसकी ओर देखा और मुस्कुरा कर कहा, "ये उदासी नहीं है। ये तो 'तसल्ली' का रंग है। देखो न, सूरज ने पूरे दिन तपिश झेली, दुनिया को रौशनी दी और अब वो शांति से विदा ले रहा है। बिना किसी शिकायत के।"

उसने अपनी नज़रें नीची कीं और घास के एक तिनके को उखाड़ते हुए कहा, "पर क्या विदा लेना इतना आसान होता है? जैसे हम इंसानों के बीच... जब कुछ टूटता है, तो पीछे एक कड़वाहट रह जाती है। क्या सूरज को दुख नहीं होता कि उसे कल फिर उसी तपिश में जलना होगा?"

मैंने जवाब दिया, "सूरज को दुख इसलिए नहीं होता क्योंकि वो हर शाम दुनिया को 'माफ़' करके ढलता है। अगर वो अपनी गर्मी का हिसाब रखने लगे, तो कभी दोबारा उग नहीं पाएगा। माफ़ी भी बिल्कुल इस शाम की लालिमा जैसी होती है—गहरी, सुकून देने वाली और सुंदर।"

उसने मेरी आँखों में झाँका, उसकी आँखों में थोड़ी नमी थी। उसने धीमे से पूछा, "तो क्या माफ़ कर देने से सब कुछ पहले जैसा हो जाता है?"

"सब कुछ पहले जैसा शायद न हो," मैंने उसका हाथ धीरे से थामते हुए कहा, "लेकिन माफ़ करने से तुम्हारे अंदर का वो 'भारीपन' ज़रूर खत्म हो जाता है। देखो, सूरज ढल रहा है तभी तो तारों को चमकने की जगह मिलेगी। जब तक तुम कल की शिकायतों को मुट्ठी में भींचे रखोगी, तब तक आने वाले सुकून के लिए हाथ खाली कैसे होगा?"

उसने एक गहरी साँस ली। चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान उभरी, जैसे बरसों का कोई बोझ उतर गया हो।

"आज पहली बार ये लाल रंग मुझे खून जैसा नहीं, बल्कि किसी पुराने घाव के भर जाने जैसा लग रहा है," उसने धीरे से कहा।

सूरज अब पूरी तरह छिप चुका था, पर आसमान में उसकी लाली अभी भी बाकी थी—बिल्कुल वैसे ही, जैसे माफ़ कर देने के बाद दिल में एक मीठा सा अहसास बाकी रह जाता है।
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गोलू
पटना से

Thursday, 8 January 2026

दूरी का भ्रम ( थोड़ा सा इश्क़ )

तुम्हारे न होने से,
सच कहूँ तो...
दुनिया के कामकाज में कोई फर्क नहीं पड़ा।
सूरज अब भी उसी वक्त निकलता है,
हवा अब भी उसी तरह बहती है,
और शहर का शोर भी
बिलकुल वैसा ही है।

सब कुछ... बेहद सामान्य है।

मगर मेरे भीतर,
एक 'अदृश्य' सा बदलाव आ गया है।
पहले, जब मैं कमरे में अकेला होता था,
तो उसे 'एकांत' कहता था,
मगर अब...
वही अकेलापन 'वीरानी' सा लगता है।

तुम्हें पता है?
अब मैं चीजों को सिर्फ देखता नहीं,
उन्हें तुम्हारी नज़र से तौलता हूँ।
कोई अच्छा दृश्य दिखे,
तो पहला ख्याल यही आता है कि
"काश! तुम भी इसे देख पातीं।"

यह अजीब विरोधाभास है 
कि भौतिक रूप से
तुम यहाँ से कोसों दूर हो,
मगर मानसिक रूप से 
तुमने मेरे भीतर इतनी जगह घेर ली है
कि मुझे अपने ही ख्यालों में
पांव रखने के लिए
तुम्हारी यादों से इजाज़त लेनी पड़ती है।

लोग कहते हैं कि दूरियों से
रिश्ते फीके पड़ जाते हैं,
मगर मेरा अनुभव अलग है।
तुम्हारी यह 'गैर-मौजूदगी'
मुझे हर पल
तुम्हारी 'मौजूदगी' का
और गहरा अहसास कराती है।

शायद...
प्रेम पास रहने का नाम नहीं,
बल्कि दूर रहकर भी
किसी को अपने भीतर
लगातार महसूस करने का नाम है।
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Tuesday, 6 January 2026

दखल (थोड़ा सा इश्क़)


तुम्हारे आने से पहले,

यकीन मानो...

मेरी दिनचर्या में कोई 'खामी' नहीं थी,

सब कुछ वैसा ही था

जैसा एक मसरूफ शहर का होता है।


वक्त पर जागना,

वक्त पर सोना,

और बीच के सारे पहर

बड़ी मुस्तैदी से खर्च करना

दुनियादारी के हिसाब-किताब में।


मगर...

जब से तुमने मेरे ख्यालों में

जगह बनाई है,

एक अजीब सा 'दखल' महसूस होता है

मेरे सधे हुए वक्त में।


अब अक्सर ऐसा होता है,

कि चाय की प्याली

हाथ में धरी रह जाती है

और भाप ठंडी हो जाती है,

क्योंकि ठीक उसी वक्त

आंखों के सामने से गुज़रती है

तुम्हारी वह हल्की सी मुस्कुराहट।


किताब के पन्ने पलटते हुए

अचानक उंगलियाँ रुक जाती हैं

किसी ऐसे शब्द पर,

जो तुम्हारे नाम जैसा लगता है,

और फिर...

घंटों तक वह पन्ना पलटा नहीं जाता।


यह प्रेम नहीं है शायद,

यह तो मेरे 'वर्तमान' में

तुम्हारी यादों की 'साज़िश' है।


जो मुझे यह अहसास दिलाती है

कि मैं जिसे 'जीना' समझ रहा था,

वह महज सांसें लेना था,

ज़िंदगी तो अब शुरू हुई है—

इस मीठी सी अव्यवस्था के साथ।


हाँ, पहले मैं सिर्फ 'व्यस्त' था,

अब मैं... 'लापता' हूँ!



Wednesday, 26 November 2025

तुमसे हसीं कोई नज़ारा नहीं मिला

तुमसे हसीं कोई नज़ारा नहीं मिला
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तुमसे अच्छा कोई सहारा नहीं मिला ,
इस दरिया को कोई किनारा नहीं मिला ।

यूं तो आएं ज़िंदगी में समझदार लोग भी ,
मगर तुम जैसा कोई सितारा नहीं मिला ।

यूं तो हजार देखे मंजर इन आंखों ने ,
तुमसे हसीं कोई नजारा नहीं मिला ..!!

हर राह पर चलती रही ये ज़िंदगानी,
पर मंजिल कोई भी दोबारा नहीं मिला ।

लाख कोशिशें की इन लबों ने मुस्कुराने की,
मगर तेरे बिन कोई इशारा नहीं मिला ।

ढूंढा मैंने इस जहाँ के हर कोने में,
पर कोई वजूद इतना प्यारा नहीं मिला ।

यूँ तो महफ़िलें सजीं हर रोज़ रोशनियों से,
मगर तेरी आँख जैसा उजियारा नहीं मिला ।

भीड़ में खोया रहा दिल, पुकारता रहा नाम तेरा,
इस भीड़ में कोई गवारा नहीं मिला ।

यूँ तो दौलत और शोहरत की कमी न हुई,
पर तेरे प्यार सा कोई खजाना नहीं मिला ।

कई साज़ बजे, कई राग अलापे गए,
मगर तेरी धड़कन सा कोई नगाड़ा नहीं मिला ।

देखा है मैंने हर रिश्ते को टूटते-बनते,
पर तेरे साथ जैसा कोई किनारा नहीं मिला ।

बहुत बातें की लोगों ने, ज्ञान की, प्रेम की,
पर तेरी खामोशी सा कोई सहारा नहीं मिला ।

हाँ, तेरी परछाई से ही है इस दिल की रौनक,
तुझसे दूर जाकर कोई गुजारा नहीं मिला ।

बस एक तू ही है जो मेरे हर दर्द की दवा है,
तेरे अलावा कोई हमारा नहीं मिला ।

यह जीवन भी अब तेरे नाम कर दिया है,
अब जीने का और कोई सहारा नहीं मिला ।

Monday, 24 November 2025

पहुंच से बाहर

मैंने दुनिया नाप ली,
पहाड़ों के
शिखरों तक पहुँच गया,
उन ऊँचे, बर्फीले
ताज को छू लिया,
जहाँ बादलों का डेरा था।

समुद्र के तल को
देख आया,
गहरे, अथाह नीलेपन में
डूब कर,
मोतियों की खान को
ढूंढ लिया,
अंधेरे की चुप्पी को
सुन आया,
जलजले की लहरों को
गले लगाया।

नदियों के आखिरी छोर
तक पहुँच गया,
उनके उद्गम के रहस्य को
पहचान लिया,
उनके बहाव की गति को
महसूस किया,
हर मोड़ पर प्रकृति के
इशारे को समझा।

मैंने इतिहास के पन्ने
पलट कर देखे,
हर सभ्यता की नींव
को टटोल लिया,
समय की धूल में दबे
राज्यों को जान लिया,
अतीत के हर किस्से को
जीकर आया।

ब्रह्माण्ड के तारों को
गिना है मैंने,
हर ग्रह की कक्षा में
झाँक लिया,
विज्ञान की प्रयोगशाला में
हर सूत्र को हल किया,
जीवन के जटिल सवालों
का जवाब दिया।

मैंने हर यात्रा
पूरी कर ली,
हर मुकाम
हासिल कर लिया,
हर बाधा
पार कर ली,
किन्तु,

“किन्तु मैं नहीं पहुँच
पाया तुम्हारे
'हृदय' तक...!!"

Sunday, 23 November 2025

बस कुछ और पल


बस कुछ और पल...

फिर यह पल भी ढल जाना है।

जो ठहरा लगता है आज,

उसका भी आगे निकल जाना है।


​जो बीते दिन हैं,

बस यादों में ही सुलझ रहे,

उनको धुंधला ही हो जाना है।

बस कुछ और पल...


​जो जीवन की डगर है,

रुकती नहीं, बहती जाती है,

उसको गंतव्य पर पहुंच जाना है।

बस कुछ और पल...


​जो हर श्वास है आती-जाती,

जैसे हवा का झोंका हो कोई,

उसको थम कर ठहर जाना है।

बस कुछ और पल...


​जो उम्मीदें हैं पनपती,

हर रोज नए ख्वाबों की तरह,

उनको स्वप्न ही बन रह जाना है।

बस कुछ और पल...


​जो कल की आहट है,

आज को लीलने को आतुर,

जरा-जरा उसको अतीत हो जाना है।

बस कुछ और पल...


जो रिश्तों की तपिश है,

दिल में धड़कती मौन सी आग,

उसे भी राख बन मिट जाना है।

बस कुछ और पल…


जो मुस्कानों का कारवां है,

आँसुओं की गलियों से गुज़रता,

उसे भी ख़ामोश रात बन जाना है।

बस कुछ और पल…


फिर सब धुंधला, सब फीका,

सिर्फ़ हवाओं में नाम रह जाएंगे,

जो आज है, वो कल कहानी बन जाना है।

बस कुछ और पल…

.....

लेखक: गोलू कुमार गुप्ता

.....

Saturday, 22 November 2025

किसी और की..!


तू ख्वाब थी जो आँखों में,

अब सच्चाई है किसी और की।


जिस दिल की तू धड़कन थी,

अब धड़कन है किसी और की।


मेरी तन्हा सी रातों में,

अब रौशनी है किसी और की।


जिस राह पे तुझे माँगा था,

अब मंज़िल है किसी और की।


तेरे बिना जो अधूरा था,

अब कहानी है किसी और की।


जिस पल में तेरी यादें थीं,

अब वह घड़ी है किसी और की।


मैं जिस गीत में डूबा था,

अब वो धुन है किसी और की।


जो मुस्कान थी होंठों पे,

अब वो हँसी है किसी और की।


तेरे बिना जो वीरान था,

अब वो बस्ती है किसी और की।


जिस छाँव में सुकून मिला,

अब वो छाया है किसी और की।


तेरे नाम पे जो जिया करता,

अब ज़िंदगी है किसी और की।


तेरा हर एक इशारा था,

अब बंदगी है किसी और की।


जिस स्पर्श से दिल महका था,

अब वो खुशबू है किसी और की।


जो लहरें थीं मेरी साँसों की,

अब वो नदी है किसी और की।


तेरे लिए जो अश्क बहे,

अब वो नमी है किसी और की।


मैं रोया तेरे ख्वाबों में,

अब वो नींद है किसी और की।


जिस आँगन में तेरा नाम लिखा,

अब वो चौखट है किसी और की।


जिस रंग से तू रंगी थी,

अब वो होली है किसी और की।


तेरे लिए जो दिल धड़का,

अब वो धड़कन है किसी और की।


तू प्यार थी जो मेरा कभी,

अब चाहत है किसी और की।

- गोलू कुमार गुप्ता

Friday, 21 November 2025

मैं हार गया..!


कहता हूँ…

सब ठीक है।

पर सच ये है…

कुछ भी ठीक नहीं है।


जिस दिन तुम गई…

उस दिन सिर्फ़ तुम नहीं गईं,

कुछ मेरा भी चला गया।

और जो बचा है…

वो मैं नहीं हूँ।


मैं हार गया हूँ।

हाँ…

सीधे, साफ़, बिना बहस....

मैं हार गया हूँ।


कभी सोचा था…

मोहब्बत संभाल लूँगा,

रिश्ता बचा लूँगा,

पर देखो....

तुम चली गईं

और मैं… वहीं का वहीं रह गया।


हा, हा, हा, हा 😅😅

मजेदार है ना?

तुम चल दीं,

और मेरी दुनिया रुक गई।


वो मोड़…

जहाँ तुमने हाथ छोड़ा था,

तब समझ नहीं आया....

तुम्हारा हाथ छूटा था,

या मेरा वजूद।


उस रात चिराग बुझा नहीं था,

बस....

आख़िरी बार लौ काँपी थी।

और फिर ख़ामोशी उतर आई....

सीधी दिल में।

ठंडी।

पत्थर जैसी।


अब शहर शोर करता है,

पर भीतर सब सन्नाटा है।

लोग चलते हैं, हँसते हैं,

और मैं…

बस देखता हूँ।

बिना महसूस किए।


तुमसे शिकवा नहीं।

तुम्हें हक़ था जाने का।

शिकायत बस खुद से है....

क्यों सोचा था,

कि तुम… ठहरोगी?


रिश्ते की जो डोर थी…

कहते हैं वो टूट गई....

झूठ।

डोर नहीं टूटी…

मैं टूटा हूँ।


अब सपने नहीं आते,

इच्छाएँ नहीं जगतीं,

और दिल…

दिल अब सिर्फ़ धड़कता है,

जीता नहीं।


तो हाँ…

आज पहली बार मान रहा हूँ....

सब खत्म।


तुम।

हम।

और वो मैं....

जो प्यार करता था।


अब बस एक ठंडी सच्चाई बची है.....

मैं हार चुका हूँ।

और तुम्हारा जाना ही

मेरी कहानी का आख़िरी वाक्य था।


हां, मैं हार गया हूं।

हां, मैं हार गया हूं।

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Saturday, 15 November 2025

“बाल मेला” – बच्चों की कल्पनाओं, सीख और मुस्कान का अनोखा साप्ताहिक संगम

“बाल मेला” – बच्चों की कल्पनाओं, सीख और मुस्कान का अनोखा साप्ताहिक संगम

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बचपन… वो उम्र जब सपने रंगीन होते हैं और कल्पनाएं पंख लगाकर आसमान छूती हैं। बच्चों की इसी रंगीन दुनिया को और भी रचनात्मक, मज़ेदार और ज्ञानवर्धक बनाने के लिए Kalam ki Taqat लेकर आ रहा है एक अनोखी साप्ताहिक ई-मैगज़ीन “बाल मेला”
नाम ही बताता है—यह एक ऐसा मेला है जहाँ हर बच्चा अपनी रुचि की कोई न कोई चीज़ ज़रूर पाएगा।

आज के डिजिटल युग में जहाँ बच्चे मोबाइल की स्क्रीन पर उलझ कर रह जाते हैं, वहीं “बाल मेला” उन्हें देगी एक सकारात्मक, रचनात्मक और सुरक्षित डिजिटल दुनिया, जहाँ वे सीख भी पाएंगे और मुस्कुराएंगे भी।


क्यों खास है ‘बाल मेला’?

“बाल मेला” सिर्फ एक मैगज़ीन नहीं, बल्कि बच्चों के लिए एक पूरा मनोरंजन-उत्सव है।
हमारा उद्देश्य है बच्चों की कल्पनाशक्ति को बढ़ाना, रचनात्मकता को पंख देना, सोचने-समझने की क्षमता को मज़बूत करना और मनोरंजन के साथ सीखने का अवसर देना।

इस मैगज़ीन में हर सप्ताह बच्चों के लिए कुछ न कुछ नया, ताज़ा और मज़ेदार होगा।


मैगज़ीन की मुख्य विशेषताएं

1. बच्चों की कहानियां

हर सप्ताह नई-नई कहानियां—कभी जंगल के दोस्तों की, कभी साहस और ईमानदारी की, तो कभी रोमांच और रहस्य की।
उद्देश्य: बच्चों को कहानी के माध्यम से नैतिक मूल्य, समझ, संवेदनशीलता और रचनात्मक सोच प्रदान करना।


2. पहेली बूझो

जो दिमाग को गुदगुदाए और बच्चे को सोचने पर मजबूर करे।
“ऐसी कौन सी चीज़ है जो जितना बढ़ती है उतना ही कम दिखती है?”
ऐसी कई मज़ेदार पहेलियां हर सप्ताह बच्चों की बुद्धि को निखारने आएंगी।


3. बच्चों की कविताएं

बाल मन को सबसे ज़्यादा भाती हैं तुकबंदी और संगीतात्मक कविताएं।
हर सप्ताह प्यारी-प्यारी कविताएं—कभी फूलों पर, कभी मौसम पर, कभी दोस्ती पर—जो बच्चों की भाषा कौशल को मजबूत करेंगी।


4. दिमागी खेल (Brain Games)

पज़ल, Sudoku Kids Version, शब्द खोज (Word Search), डॉट्स जोड़ो, क्विक मैथ्स…
इससे बच्चों का IQ, तर्क शक्ति, और एकाग्रता बेहतर होगी।


5. ब्लॉग (Children’s Blog Section)

बच्चों को खुद के विचार व्यक्त करने का मौका।
एक ऐसा प्लेटफॉर्म जहाँ बच्चे अपना छोटा सा ब्लॉग लिख सकते हैं—
● अपनी छुट्टियों का अनुभव
● अपनी पसंदीदा किताब
● किसी त्योहार की याद
● या कोई भी मज़ेदार बात

यह सेक्शन बच्चों में लेखन कौशल को बढ़ावा देगा।


6. चुटकुले (Jokes Junction)

क्योंकि बच्चों की हंसी से प्यारी कोई आवाज़ नहीं।
हर सप्ताह ऐसे चुटकुले जो बच्चे दोस्तों और परिवार के साथ खुशी-खुशी साझा करें।


“बाल मेला” क्यों ज़रूरी है?

✔️ आज के बच्चे डिजिटल हैं—पर उन्हें सही प्रकार का डिजिटल कंटेंट चाहिए।
✔️ किताबों से दूर होते बच्चों को दोबारा पढ़ने की ओर आकर्षित करना।
✔️ माता-पिता के लिए एक सुरक्षित, गुणवत्ता-युक्त और शैक्षणिक विकल्प उपलब्ध कराना।
✔️ बच्चों के सर्वांगीण विकास में मदद करना—रचनात्मक, भाषाई, भावनात्मक और मानसिक विकास।

“बाल मेला” बच्चों की वही दुनिया बनाना चाहता है, जहाँ वे सीखें भी और खेलें भी।


Kalam ki Taqat का उद्देश्य

Kalam ki Taqat हमेशा से शब्दों की शक्ति और रचनात्मकता के माध्यम से समाज में सकारात्मकता लाने के लिए काम करता आया है।
“बाल मेला” उसी उद्देश्य को आगे बढ़ाने की दिशा में हमारा एक महत्वपूर्ण कदम है।

हम चाहते हैं कि हर बच्चा—चाहे शहर का हो या गाँव का—डिजिटल माध्यम में भी सीखने और आगे बढ़ने के बेहतरीन अवसर पाए।


आप भी जुड़ें ‘बाल मेला’ से

● अपने बच्चों के लिए इसे सब्सक्राइब करें
● बच्चों को अपनी कहानी, कविता, ड्रॉइंग या ब्लॉग भेजने के लिए प्रेरित करें
● इसे स्कूलों, टीचर्स और पैरेंट्स तक पहुँचाएँ

क्योंकि जब बच्चे सीखेंगे, मुस्कुराएंगे, और सपने देखेंगे—तभी भविष्य मजबूत होगा।


अंत में…

“बाल मेला” सिर्फ एक मैगज़ीन नहीं,
यह बचपन का उत्सव,
कल्पना का संसार,
और सीख का रंगीन पुल है।

Kalam ki Taqat आपको और आपके बच्चों का इस नए सफर में स्वागत करता है।
आइए, मिलकर बच्चों की दुनिया को और सुंदर बनाएं।


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Friday, 26 September 2025

गांव और नवरात्रि



🌺 नवरात्रिमय गांव 🌺
___________________
नवरात्र का महीना है। गांव की चौपाल, गली-कूचे, मंदिर और मेला—सब एक अलग ही रंग में रंगे हुए हैं। जैसे ही मैं गांव पहुंचा, लगा मानो पूरा वातावरण मां दुर्गा के भक्ति रस में डूब गया हो।

हर ओर से गूंज रही आवाज़—
“श्री श्री काली माई दुर्गा पूजा समिति आप सभी ग्रामवासियों का हार्दिक अभिनंदन करती है और करती ही रहेगी।”

इसके साथ देवी मां के भजन, ढोल-नगाड़ों की थाप और शंखनाद पूरे गांव को और भी अधिक नवरात्रिमय बना रहे थे। सन्नाटा कहीं नहीं था, बल्कि हर कोना जीवन और उल्लास से भर गया था।

गांव के कुछ युवा सदस्य घर-घर जाकर पूजा का चंदा बटोर रहे थे। उनके उत्साह में सेवा भाव साफ झलकता था। मेले में दुकानों की चहल-पहल, गुब्बारों की उड़ान, बच्चों की खिलखिलाहट—सब मिलकर गांव को एक त्यौहार की धरती बना रहे थे।

मैं अपने कदमों को थामे गांव के तीन मुहान से घर की ओर चला। रास्ते में विजय चाचा दिखे—सिर पर गमछा, हाथ में खंती। उनकी चाल हमेशा की तरह धीमी मगर सधी हुई। शायद खेतों की ओर जा रहे हों, या फिर यूं ही अपनी मिट्टी का हालचाल लेने निकले हों।

घर के मड़ई में मेरी गाय बंधी थी। मड़ई की छांव तले खड़ी उसकी आंखें जैसे कह रही हों—“मुझे ये बंधन क्यों?” लेकिन फिर भी वह शांति से खड़ी थी। उसके पास से गुजरते हुए लगा जैसे गांव की आत्मा ही मुझे देख रही हो।

 बगान में नेनुआ और लौकी की बेलें लहराती थीं। उन पर खिले फूल हवा में ऐसी सुगंध घोल रहे थे, जो मन को भक्ति और श्रृंगार दोनों रस में डुबो दे। तितलियां उन फूलों पर जैसे रंग भर रही थीं, मानो गांव का श्रृंगार स्वयं प्रकृति कर रही हो।

अचानक, छोटकी बहन दौड़ती आई। आकर मेरे पैर छुए और बोली, “प्रणाम भैया।”
उसके हाथ में लौटनी थी, जल की बूंदें अब भी चमक रही थीं। चेहरे पर पूजा का तेज और आंखों में स्नेह देखकर क्षणभर को लगा—क्या सचमुच मैं किसी देवता से बढ़कर हूं? पर तुरंत मन ने टोका—नहीं, इंसान भगवान कैसे हो सकता है! शायद यह तो मेरे भावों की उड़ान थी।

और तभी मां दिखीं। मां रसोई में व्यस्त थीं। चेहरे पर वही सहजता, वही प्रेम। मां को देखना और उनका आशीर्वाद लेना मानो मेरे लिए नवरात्र की सबसे बड़ी पूजा हो।

कलम अब रुकना चाहती है। क्योंकि मां की ममता और गांव का नवरात्र—दोनों ही शब्दों से परे हैं।
आज इतना ही लिख पाता हूं। आगे कभी मन हुआ, तो इस श्रृंगारमय गांव की और बातें आपसे जरूर साझा करूंगा।


Monday, 1 September 2025

चल झूठी...!

"तुम कितना झूठ बोलती हो ना।"

"अब मैंने क्या कहा?"

"कुछ कहा ही तो नहीं।"

"मतलब?"

"कुछ नहीं, वापस कब आओगी?"

"कहो तो जाऊं ही ना?"

"मैं रोकुंगा तो रुक जाओगी?"

"रोक के देख लो।"

"रुक जाओ?

"ठीक है।"

"रुकना चाहती हो?"

"उम्म, हां।"

"फिर वही कहूं ?"

"क्या?"

"तुम कितना झूठ बोलती हो ना।"

Friday, 29 August 2025

ख्वाबों में खोया मैं...!


कहते हैं कि मोहब्बत तब सबसे सुंदर होती है जब वह अधूरी होती है।
जब वह किसी शब्द से नहीं, बल्कि आँखों की झलक, छोटी-सी मुस्कान और अनजाने इशारों से बयां होती है।
आज मैं अपने दिल की वही अधूरी दास्तान लिख रहा हूँ — एक इंस्टा स्टोरी के बहाने, जिसने मेरे भीतर कवि को फिर से जगा दिया।

सुबह इंस्टाग्राम खोला और उसकी स्टोरी देखी।
क्लिक किया और बस! मेरी आँखें जैसे ठहर गईं।

वो खड़ी थी, चेहरा हल्की-सी रोशनी में नहाया हुआ। काजल से सजी आँखें, जिनमें कहीं गहराई में रहस्य छिपे थे।
लेकिन तस्वीर सिर्फ उसकी नहीं थी। तस्वीर में उसका पूरा कमरा बोल रहा था —

  • दीवार पर घड़ी, जो उसकी हर धड़कन को समय में बांध रही थी।

  • कोने में रखा पांडा टेडी, जैसे उसका वफ़ादार साथी हो।

  • बिस्तर पर रखी उसकी डायरी, जो उसके दिल की हर बात लिखी जाती होगी।

  • खुली हुई खिड़की, जैसे उसके सपनों का दरवाज़ा।

  • बगल में रखी किताबें, जिनमें वह अपना संसार ढूँढती होगी।

  • कपड़ों से भरी अलमारी, जो उसकी सादगी और रंगीनियों का संगम थी।

  • और फिर वो खुद - उसकी निगाहें, उसका काजल, उसकी मासूम पर कातिल मुस्कान।

मैं उस तस्वीर को बस देखता ही रह गया।

देखते-देखते मेरे ख्यालों ने उड़ान भरी।
मैंने सोचा, अगर मैं उसके कमरे में मौजूद होता तो?
लेकिन मेरे ख्याल सीधे नहीं गए - उन्होंने मुझे उसकी हर चीज़ बनने पर मजबूर कर दिया।

काश मैं उसका आईना होता, ताकि वो रोज़ मुझमें झाँकती और मैं उसकी आँखों का संसार देखता।
काश मैं उसकी डायरी होता, ताकि वो अपने हर राज़, हर दर्द और हर सपने मुझे सौंप देती।
काश मैं उसकी घड़ी होता, ताकि हर पल उसकी नज़र मुझ पर रहती।
काश मैं उसका तकिया होता, ताकि उसकी थकान मेरी गोद में मिटती।
काश मैं उसका काजल होता, ताकि उसकी आँखों की शोभा का हिस्सा बन जाता। 

इन्हीं ख्यालों में डूबते-डूबते मेरी कल्पना कविता का रूप लेने लगी।

तेरी आँखों का आईना बन जाऊँ,
तेरी हर झलक में खो जाऊँ। तेरी पलकों की छाँव में रहकर, तेरे सपनों की राह सजाऊँ। तेरे चेहरे की रौशनी बनकर, तेरी मुस्कान में ढल जाऊँ। तेरे होंठों की हँसी में छुपकर, तेरे ग़मों को चुरा लाऊँ। तेरी साँसों की सरगम सुनकर, तेरे दिल का गीत गाऊँ। तेरी जुल्फ़ों की खुशबू बनकर, तेरे कंधों पर बिखर जाऊँ। तेरे तकिए की नरमी बनकर, तेरी थकान को सहलाऊँ। तेरे काजल की रेखा बनकर, तेरी आँखों में चमक बढ़ाऊँ। तेरी डायरी का पन्ना बनकर, तेरे दिल की कहानियाँ लिख पाऊँ। तेरे ख्वाबों की रात बनकर, तेरे ख़यालों में सदा ठहर जाऊँ। तेरे आँगन की हवा बनकर, तेरी जुल्फ़ों से खेल जाऊँ। तेरी घड़ी की सुई बनकर, तेरे हर पल का साथी बन जाऊँ। तेरे कमरे की खामोशी बनकर, तेरी तन्हाई में गुनगुनाऊँ। तेरे होंठों की सरगम बनकर, तेरी धड़कनों में सुर सजाऊँ। तेरे दुपट्टे की लहर बनकर, तेरी चाल में झूम जाऊँ। तेरी मुस्कान की चिंगारी बनकर, तेरे ग़मों को राख कर जाऊँ। तेरे बिस्तर की चादर बनकर, तेरे सपनों को ढँक जाऊँ। तेरी आँखों की नमी बनकर, तेरे आँसुओं में भी मुस्कराऊँ। तेरे दिल की धड़कन बनकर, तेरी मोहब्बत में सदा बहक जाऊँ।

मैं इन ख्वाबों की लहर में तैर ही रहा था कि अचानक देखा - वो स्टोरी डिलीट हो गई।
जैसे किसी ने मेरी धड़कनों से खेल लिया हो।

क्या उसने गलती से पोस्ट किया था?
क्या उसे डर था कि लोग क्या सोचेंगे?
या फिर - क्या वो सचमुच मेरे लिए थी?

दिल ने तो यही कहा - शायद वो जानती है कि मैं देखूँगा। शायद कहीं उसके दिल में भी मेरा नाम लिखा हो।

दोस्तों, मोहब्बत यही होती है।
जहाँ बाकी लोग कहेंगे कि "ये तो बस एक स्टोरी थी", वहीं एक आशिक उसे अपनी सबसे बड़ी कहानी बना देता है।

उसकी उस तस्वीर ने मुझे उसकी ज़िंदगी की गहराई दिखा दी।
उसकी हर चीज़ ने मुझसे कुछ कहा।
और जब उसने वो स्टोरी हटाई, तो मुझे लगा कि उसने कोई गुप्त संदेश भेजा है - सिर्फ मेरे लिए।

आज का दिन मेरे लिए साधारण नहीं था।
वो इंस्टा स्टोरी मेरे लिए कविता बन गई, उसकी हर चीज़ शृंगार रस की पंक्तियाँ बन गई।

क्या सचमुच वो मुझे सोच रही थी?
या फिर ये सब मेरी कल्पना है?
सच तो मुझे भी नहीं पता।

लेकिन एक बात तय है - जब तक मेरा दिल धड़कता रहेगा, ये मोहब्बत ज़िंदा रहेगी।
और जब तक मेरी कलम चलती रहेगी, ये भावनाएँ कविता बनकर बहती रहेंगी।


👉 दोस्तों, ये थी मेरी आज की दास्तान।
शायद आप सोचें कि मैं सिर्फ ख्वाबों में जी रहा हूँ। लेकिन सच कहूँ तो - प्यार की शुरुआत हमेशा ख्वाबों से ही होती है।और कभी-कभी ख्वाब ही सबसे हकीक़त वाली चीज़ लगते हैं।

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Sunday, 24 August 2025

ज़रूरी है क्या..? 💔

 ज़रूरी है क्या.. 💔



लबों तक जो बात आये,

हर वो बात करना ज़रूरी है क्या?

इश्क़ तो सबको हो जाता है,

ये बताओ इज़हार करना ज़रूरी है क्या?


फ़रिश्ता बन हज़ार ख़्वाब दिखाकर,

झूठे वादे करना ज़रूरी है क्या?

रिश्तेदारी तो सब जानते हैं,

ये बताओ सबको अपना कहना ज़रूरी है क्या?


बरसों पहले जो आईना टूटा था,

आज वापस जुड़ने लगे तो मुश्किल है क्या?

तुमने तो मोहब्बत का अंजाम देखा है,

ये बताओ दोबारा इश्क़ करना सही है क्या?


बेइंतहां न सही, इश्क़ मैंने भी किया था,

इसका भरोसा दिलाना ज़रूरी है क्या?

तुम जो रूठ जाते हो हर छोटी सी बात पर,

हर बार तुम्हें मनाना ज़रूरी है क्या?


सूरत नहीं, सिरत पूजता हूँ,

ऐसी बातें कहना ज़रूरी है क्या?

तुम्हारे बिन मैं एक पल नहीं जी सकता,

हर एक से ये कहना ज़रूरी है क्या?


दिल के जज़्बात आँखों से टपक पड़ें,

हर आंसू दिखाना ज़रूरी है क्या?

खामोशी भी तो एक जुबान होती है,

हर दर्द को बताना ज़रूरी है क्या?


मोहब्बत अगर सच्ची है दिल से,

तो सबूतों में तोलना ज़रूरी है क्या?

धड़कनों में तुम्हारा नाम बस जाए,

तो दुनिया को बताना ज़रूरी है क्या?


रिश्ते निभते हैं एहसास से,

हर बार क़सम खाना ज़रूरी है क्या?

अगर तुम समझते हो मेरी खामोशी,

तो लफ़्ज़ों में समझाना ज़रूरी है क्या?

Friday, 22 August 2025

अपनी बीबी/प्रेमिका से झगड़ा कैसे करें?

प्यार की कहानी हमेशा सीधी रेखा जैसी नहीं होती। कभी इसमें फूल होते हैं, तो कभी काँटे। कभी बातें मीठी लगती हैं, तो कभी वही बातें कड़वी हो जाती हैं। अक्सर लोग कहते हैं कि प्यार को निभाने के लिए समझदारी, भरोसा और मीठे शब्द चाहिए। लेकिन असल सच्चाई ये है कि रिश्तों की गहराई झगड़े से ही मापी जाती है। झगड़ा न हो तो रिश्ता अधूरा है। और हाँ, झगड़ा करना भी एक कला है। झगड़े का सही इस्तेमाल रिश्ते को मज़बूत बना देता है और गलत तरीके से किया गया झगड़ा रिश्ता तोड़ भी सकता है। तो आज हम इस कला को थोड़ा गंभीरता से और बहुत सारी हंसी-मज़ाक के साथ सीखेंगे।

 झगड़ा करने का पहला और आज़माया हुआ तरीका है बिना वजह सवाल पूछना। ये तरीका इतना आसान है कि हर प्रेमी को एक बार ज़रूर आज़माना चाहिए। लड़की फोन पर ज़रा देर से बोले, बस पूछ डालो: “इतनी देर क्यों लगा दी? किससे बात कर रही थी?” अगर उसने जवाब दिया कि “नहा रही थी”, तो आप कह सकते हैं: “इतनी देर नहाने में क्यों लग गई?” अगर बोली “माँ के पास थी”, तो तुरंत कह दो: “माँ के पास जाने में इतना राज़ क्यों छिपाना पड़ा?” देखिए, मामला कहाँ से कहाँ पहुँच जाएगा। ये बिना वजह सवाल रिश्ते की ज़मीन पर बारूद बिछाने जैसा है, जिसमें चिंगारी आपको खुद लगानी भी नहीं पड़ेगी। 

 लेकिन सिर्फ सवाल करना ही काफी नहीं है। खाने पर कमेंट करना भी एक बेहतरीन हथियार है। मान लो पत्नी ने प्यार से आपके लिए आलू के पराठे बनाए और आप बड़े आराम से कह दें: “ठीक है, लेकिन मम्मी जैसे स्वाद नहीं आए।” अब चाहे आपकी बीबी ने घंटों मेहनत की हो, उसका गुस्सा मिनटों में फूट पड़ेगा। गर्लफ्रेंड ने मैगी बनाई हो और आप कह दें: “लगता है नमक भूल गई हो”, तो यकीन मानिए उस मैगी का स्वाद आपके झगड़े की तीखी बहस में बदल जाएगा। और मज़े की बात ये है कि आप चुप रहकर भी इस झगड़े का आनंद ले सकते हैं क्योंकि खाने का जिक्र होते ही बहस अपने आप लंबी खिंचती चली जाती है। 

 अगर कभी लगे कि झगड़े के लिए नया टॉपिक नहीं मिल रहा, तो पुराने किस्से निकाल लेना चाहिए। पुराने झगड़े रिश्तों का खज़ाना होते हैं। “तुम्हें याद है 2019 में दिवाली के दिन क्या हुआ था?” या “तुम्हें वो दिन याद है जब तुम मुझे 45 मिनट लेट करवा दी थी?” ये बातें सुनते ही सामने वाली की आँखों में पुराना गुस्सा लौट आएगा और झगड़े की आग फिर से धधकने लगेगी। दरअसल, पुराने झगड़े रिश्तों में उतने ही काम आते हैं जितना पुराना मसाला, जिसकी खुशबू आज भी ताज़ा हो जाती है। 

 अब आती है उसकी पसंद पर तंज कसने की बारी। मान लीजिए वो रणवीर सिंह की दीवानी है। अब आप कह दीजिए: “ये लड़का हीरो है या कपड़े की दुकान? कभी लगता है शादी में बाराती से भी ज़्यादा चमकीले कपड़े पहन लेता है।” ये सुनते ही वो रणवीर की तारीफ़ पर उतर आएगी और आप उसकी बुराई पर अड़े रहेंगे। नतीजा—दोनों में बहस होगी और झगड़ा अपने आप तैयार हो जाएगा। यही तरीका किसी भी पसंद पर लागू किया जा सकता है—उसकी पसंदीदा किताब, उसकी मनपसंद वेब सीरीज़, यहाँ तक कि उसकी पसंदीदा चॉकलेट पर भी। 

 शॉपिंग पर तो झगड़े की इतनी गुंजाइश होती है कि उसपर पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है। वो मॉल से घंटे भर भटककर नई ड्रेस लेकर आएगी और आप कह दीजिए: “ये पिछली वाली जैसी ही लग रही है।” या फिर: “इतना पैसा खर्च कर दिया और कुछ खास नहीं दिख रहा।” अब चाहे ड्रेस पर कितना भी डिस्काउंट क्यों न मिला हो, उसकी नज़रों में आपने झगड़े का सिग्नल ऑन कर दिया है। और अगर आप थोड़े और चुभते शब्द बोलना चाहते हैं तो कहिए: “तुम्हें अभी तक शॉपिंग करना नहीं आया।” अब वो आपको पूरा फैशन शो दिखाकर साबित करेगी कि उसका चुनाव ही बेस्ट है। 

 डेट पर लेट पहुँचना भी झगड़े का शॉर्टकट है। उसने कहा 6 बजे आना और आप आराम से 6:45 पर पहुँच गए। जब वो गुस्से से बोलेगी तो आप बड़ी मासूमियत से कहिए: “ट्रैफिक बहुत था।” और अगर वो जवाब में बोले कि “तुम्हें पहले निकलना चाहिए था” तो तुरंत पलट दीजिए: “वैसे तुम तो लेट होने की आदी हो, आज मुझे लेट क्यों नहीं होने दिया?” अब देखिए, ये झगड़ा कितनी देर तक चलता है। 

 तारीफ में कंजूसी करना भी बड़ा असरदार तरीका है। जब वो दो घंटे सजने-संवरने में लगाए और आप कह दें—“ठीक लग रही हो”—तो ये सुनते ही उसके चेहरे की मुस्कान उड़ जाएगी। उसके लिए ये insult है और आपके लिए झगड़े का गेटपास। और अगर आपने थोड़ी और हिम्मत दिखा दी तो कह सकते हैं: “वैसे पिछली बार बेहतर लग रही थी।” अब तो युद्ध छिड़ना तय है। 

 सोशल मीडिया का युग झगड़े को और आसान बना देता है। उसने फेसबुक पर एक शायरी डाली—बस पूछो: “ये किसके लिए था?” इंस्टाग्राम पर उसकी फोटो पर हार्ट आया तो कहो: “इतना प्यार कौन कर रहा है?” अब वो चाहे जितनी सफाई दे, आपको बस शक जताते रहना है। झगड़ा अपने आप चलता रहेगा। 

 और हाँ, अगर ये सब भी कम पड़ जाए तो सबसे घातक हथियार है—उसकी सहेलियों का ज़िक्र। आप बस कह दीजिए: “तुम्हारी फ्रेंड पूजा मुझसे ज्यादा स्मार्ट है।” अब पूजा कितनी भी साधारण हो, आपकी प्रेमिका की नज़रों में वो अचानक खलनायिका बन जाएगी। अब देखिए, वो कैसे आपकी बातों को उलझाकर पूरे दिन का माहौल गर्म कर देती है। 

टीवी या वेब सीरीज़ भी झगड़े का अच्छा साधन है। उसे रोमांटिक मूवी देखनी हो और आप कहें: “नहीं, मुझे थ्रिलर देखना है।” वो बोले: “ये सीरीज़ बहुत अच्छी है”, तो आप कह दीजिए: “बकवास है।” अब आप दोनों की पसंद एक-दूसरे की दुश्मन बन चुकी है और आप झगड़े का सीधा आनंद उठा सकते हैं। 

 छुट्टी पर जाने का प्लान बनाना भी अक्सर झगड़े का कारण बनता है। वो कहे: “गोवा चलते हैं” और आप कहें: “नैनीताल अच्छा रहेगा।” अब कोई बीच चाहेगा और कोई पहाड़। बहस बढ़ती जाएगी और छुट्टी का प्लान बनते-बनते अधर में लटक जाएगा। मगर आपके पास झगड़े का नया किस्सा जुड़ जाएगा। 

 रिश्तेदारों पर हल्का-सा तंज कसना भी बड़े काम का तरीका है। आप कह सकते हैं: “तुम्हारी आंटी बहुत बोलती हैं” या “तुम्हारे भाई को तो कोई काम ही नहीं आता।” अब आपको रिश्तेदारी की पूरी लिस्ट सुनाई जाएगी और आप बीच-बीच में अपनी सफाई देते रहेंगे। झगड़ा चलता रहेगा और रिश्ते का मसाला भी बढ़ता रहेगा। 

 कभी उसकी आदतों पर ताना कसना भी बेहद असरदार होता है। “तुम्हें हमेशा देर होती है।” या “तुम सुनती ही नहीं हो।” ये बातें छोटी लगती हैं लेकिन असर गहरा होता है। वो समझेगी कि आप उसकी कमियाँ गिना रहे हैं और फिर बहस का माहौल गरम हो जाएगा। 

 और जब सारे हथियार फेल हो जाएँ तो साइलेंट ट्रीटमेंट सबसे खतरनाक तरीका है। जब वो कुछ पूछे तो आप बस हम्म कहें। या फिर बिल्कुल चुप रहें। ये खामोशी झगड़े को उस स्तर तक पहुँचा देती है जहाँ शब्दों से ज्यादा गुस्सा चेहरे पर दिखने लगता है। 

 तुलना करना तो रिश्तों में झगड़े का परमाणु बम है। आप बस कह दीजिए: “देखो शर्मा जी की बीवी कितनी समझदार है।” अब आपके घर में महाभारत शुरू हो चुका है। इस एक लाइन से आप घंटे भर का झगड़ा पक्का कर सकते हैं। 

 ईगो की चिंगारी भी बड़ी खतरनाक होती है। जब बहस हो रही हो तो हमेशा आखिरी लाइन आप ही बोलें। “मेरी बात मानो वरना…” भले ही “वरना” का कोई मतलब न हो, लेकिन झगड़ा लंबा खिंच जाएगा। और जब तक आपकी प्रेमिका ये साबित न कर दे कि उसकी बात सही है, झगड़ा चलता रहेगा। 

 छोटी-छोटी गलतियों को बड़ा बनाना भी एक कला है। अगर उसने पानी गिरा दिया तो कह दीजिए: “तुमसे कुछ संभलता ही नहीं।” ये एक लाइन छोटी गलती को पहाड़ बना देगी। अब वो साबित करने में जुट जाएगी कि वो सब कुछ संभाल सकती है और आप उसकी बात काटते रहेंगे। 

 “ना” कहना भी झगड़े का सीधा रास्ता है। वो कहे: “चलो बाहर चलते हैं।” आप कहें: “ना।” बस, अब प्रोग्राम तो रद्द हुआ ही, झगड़ा भी पक्का हो गया। 

 और अंत में, सबसे बड़ा हथियार—माफी न माँगना। गलती आपकी हो या न हो, माफी मांगना ही नहीं। बस कहिए: “मुझे क्यों सॉरी बोलना चाहिए?” ये एक लाइन झगड़े को अगले लेवल तक पहुँचा देती है। 

 अब सवाल ये है कि इतने सारे झगड़े करने के बाद रिश्ता कैसा रहेगा? तो जवाब है—बिल्कुल मज़ेदार। झगड़े अगर थोड़ी समझदारी से किए जाएँ, तो रिश्तों को और मजबूत बना देते हैं। ये रिश्तों में वो नमक हैं जो स्वाद को परफेक्ट करते हैं। याद रखिए, प्यार अगर रसगुल्ले जैसा मीठा है तो झगड़े वो समोसे की मिर्च हैं जो जीभ पर चुभती भी हैं और स्वाद भी देती हैं। 

 तो अगली बार जब भी लगे कि रिश्ता बहुत शांत हो गया है, तो ऊपर दिए गए तरीकों से थोड़ी-सी नोकझोंक छेड़ दीजिए। इससे न केवल आपका रिश्ता जीवंत रहेगा बल्कि आपके पास सुनाने के लिए हज़ारों किस्से भी होंगे।

Thursday, 14 August 2025

श्रृंगार में तुम !

वो जुल्फ़ें, वो काजल, वो चंचल निगाहें,
लुटा दें मोहब्बत, चुरा लें पनाहें।

वो झुमके, वो पायल की मीठी सी टनक,
मिटा दे दिलों की तमाम ही खनक।

वो होंठ गुलाबी, वो मीठी सी हँसी,
खिल उठे बहारें, महक जाए धरी।

गालों पे लाली, वो शरम का असर,
लगता है जैसे हो पहला सफ़र।

ओढ़नी से झांकता तेरा चेहरा गुलाल,
मानो सजे हो बसंती सा हाल।

तेरे कदमों की आहट, वो नरम सा चलन,
जगा दे हज़ारों हसीन सा सपन।

तेरा इठलाना, तेरी अदाओं का खेल,
बसा दे दिलों में मोहब्बत का मेल।

तेरी सांसों की खुशबू, वो नशा सा असर,
बना दे मुझे तेरा दीवाना मुखर।

शायर तो मैं पहले कभी था नहीं,
पर तुझको देखकर लफ़्ज़ थमते ही नहीं।

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